सुप्रीम कोर्ट ने कोल्हापुर के एक मंदिर की हथिनी महादेवी के स्थानांतरण को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान जांच के लिए हाई पावर्ड कमेटी गठित करने का संकेत दिया है. अदालत ने कहा कि अखबारों और सोशल मीडिया में आई खबरों के आधार पर सीघे कार्रवाई नहीं कि जा सकती, लेकिन सच सामने लाने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन जरूरी है.
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हमें सच्चाई जानने के लिए एक विशेषज्ञ समिति चाहिए. केवल मीडिया रिपोर्ट्स या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर भरोसा नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने याचिककर्ताओ से समिति में शामिल किए जाने वाले सदस्यों के नाम सुझाए. याचिका में वंतारा में रखे गए कैद हाथियों की वापसी की निगरानी के लिए समिति बनाने की मांग की गई थी. साथ ही सभी जंगली जानवरों और पक्षियों को जंगल में छोड़ने के आदेश देने की मांग की गई है.
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिककर्ताओ का कहना है कि हथिनी को जबरन ले जाया गया और वह मंदिर की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है. जुलाई में मुंबई हाई कोर्ट ने इसको लेकर जैन समुदाय की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया था. दायर जनहित याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले की महादेवी हथिनी को गुजरात के जामनगर स्थानांतरित किए जाने का विरोध हो रहा है. दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि त्रिपुरा हाई कोर्ट द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति असंवैधानिक है और वाइल्डलाइफ संरक्षण अधिनियम 1972 सहित अन्य कानूनों का उल्लंघन किया गया है.
याचिकाकर्ता ने कहा है कि मंदिरों से हाथियों को जबरन ले जाया गया और मालिकों की सहमति के बिना वंतारा में रखा गया है. दक्षिण अफ्रीका से भारत लाए गए चीतों, बब्बरों, शेरों और तेंदुओं जैसे जंगली जानवरों को बड़ी संख्या में भारत लाया गया और वंतारा में रखा गया है. दायर याचिका में 2014 में सुप्रीम कोर्ट में WRRC नामक एनजीओ द्वारा दायर याचिका का हवाला दिया गया. जिस याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाथियों को मंदिरों में इस्तेमाल करने को लेकर आदेश दिया था.
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