Bhagwant Mann OSD Case: पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के कार्यालय से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपो की सीबीआई जांच के आदेश के खिलाफ दायर पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई से जस्टिस शील नागू ने खुद को अलग कर लिया है. अब नई बेंच 12 अक्टूबर को सुनवाई करेगी.
तीन पन्नों से जुड़े मामले को सीबीआई को सौपनें का आदेश दिया था
दरअसल जस्टिस शील नागू पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट में जज के तौर पर रहते हुए इस केस में शिकायतकर्ता निखिल शराफ को लेकर आदेश पारित कर चुके है. मामले की सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि वह अपनी याचिका में जस्टिस शील नागू के फैसलों को आधार नहीं बना रहे है. लेकिन बेंच की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि बेंच को मामले में सुनवाई करना उचित नहीं है.
हम बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहे है. ना जाने कौन सा पक्ष इसको ही लेकर सवाल उठाने लगे. सुप्रीम कोर्ट में17 बेंच है, कोई दूसरी बेंच भी इस पर सुनवाई कर सकती है. हम मामले को सीजेआई के पास भेजेंगे, वो नई बेंच का गठन करेंगे. हाई कोर्ट ने ईडी की ओर से पंजाब के डीजीपी गौरव यादव को भेजे गए तीन पन्नों से जुड़े मामले को सीबीआई को सौपनें का आदेश दिया था.
केस दर्ज करने और दो महीने के भीतर स्टेट्स रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश
हाई कोर्ट ने सीबीआई को मामले में केस दर्ज करने और दो महीने के भीतर स्टेट्स रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था. ईडी द्वारा भेजे गए पत्र में आरोप लगाया गया था कि मुख्यमंत्री के ओएसडी राजवीर घुमन और उनके सहयोगी नितिन गोहल तथा बीर देविंदर ट्रांसफर पोस्टिंग के साथ सरकारी टेंडरों में कथित तौर पर हस्तक्षेप कर रहे थे.
एजेंसी ने इस मामले में एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी. पत्र के अनुसार, इन तीनों ने कथित तौर पर सरकारी अधिकारियों के तबादले और पोस्टिंग, सरकारी कामकाज और टेंडर की प्रक्रियाओं में दखल दिया था. एजेंसी ने ऐसे सबूतों का भी जिक्र किया जिनसे कथित तौर पर पता चलता है कि पोस्टिंग को प्रभावित करने, गोपनीय सरकारी दस्तवेज़ों तक पहुचने और प्रशासनिक मंजूरी व अन्य आधिकारिक प्रक्रियाओं में दखल देने की कोशिश की गई.
क्या है मामला?
हाई कोर्ट ने पंजाब पुलिस और राज्य सरकार को मामले से संबंधित सभी दस्तावेज सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया था. इससे पहले विकास सिंह ने कहा था कि हाई कोर्ट का सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देना सही नहीं है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विजय मदनलाल चौधरी फैसले के पैराग्राफ 15 का हवाला देते हुए कहा था कि एफआईआर दर्ज करने की कार्रवाई के लिए संज्ञेय अपराध का आधार होना जरूरी है.
उन्होंने कहा था कि यह मामला ट्रांसफर और पोस्टिंग से जुड़े आरोपों से संबंधित है और राज्य सरकार मामले की जांच कर रही थी. ईडी की ओर से दिए गए दस्तावेज भी पूरी तरह साफ नहीं थे. विकास सिंह ने कहा था कि चुनाव के समय इस तरह के मामलों को उठाया जा रहा है और यह मामला संघीय ढांचे से भी जुड़ा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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