मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग.वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले महीने से सुनवाई करेगा. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा क्या शादी का मतलब व्यक्ति की आजादी का खत्म होना है?, क्या मैरिटल रेप के लिए कानूनी कार्रवाई की जा सकती है? कोर्ट ने निर्देश दिया गया इस मामले में तीन हफ्ते बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेगा. कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे के बाद यह निर्देश दिया है.
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि शादी से किसी महिला की व्यक्तिगत आजादी खत्म नही हो सकती. लेकिन शादी के अंदर रेप के लिए मुकदमा चलाने की इजाजत देने से पहले कोर्ट को बीएनएस के तहत मौजूदा कानून अपवाद पर विचार करना होगा.
कोर्ट ने कहा कि वह दो सवालों की जांच करेगा. पहला क्या मैरिटल रेप का अपवाद बने रहने पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है? और दूसरा क्या यह अपवाद खुद संविधान के हिसाब से सही है. कोर्ट ने कहा कि वह इस अपवाद के दायरे को सीमित करने के असर की जांच करेगा और यह भी देखेगा की क्या किसी ऐसे काम को जिसे अपराध की श्रेणी से साफ तौर पर बाहर रखा गया है, व्याख्या के जरिये उसके दायरे में लाया जा सकता है. इससे पहले इंदिरा जयसिंह ने कहा था कि मैरिटल रेप गंभीर मामला है, इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए. उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया था कि इस मामले में केंद्र सरकार के तरफ से अभी तक जवाब दाखिल नही किया गया है. जिसके बाद सीजेआई ने कहा था कि अगर केंद्र जवाब दाखिल करना नही चाहता है तो कानूनी दलीलें पेश करे.
राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांगा अपना पक्ष रखने का अधिकार
बता दें कि राजस्थान सरकार की ओर से दायर हस्तक्षेप अर्जी पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है. राजस्थान सरकार ने पूरे मा सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने की मांग की है. राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश प्रार्थना पत्र में कहा गया है कि यह महिलाओं के प्रति हिंसा से जुड़ा मामला है, ऐसे में इन्टरविनर के रूप में राजस्थान का भी पक्ष सुना जाए. राज्य सरकार की ओर से दायर प्रार्थना पत्र में कहा है कि भारतीय दंड संहिता में पति अपनी 15 वर्ष से अधिक आयु की पत्नी से संबंध बनाता है तो वह बलात्कार नही है. प्रार्थना पत्र में यह भी कहा गया है कि यह मुद्दा महिलाओं के अधिकारों व आपराधिक न्याय प्रणाली से जुड़ा बुआ है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय महिलाओं को प्रभावित करेगा.
राज्य सरकार वैवाहिक बलात्कार के पीड़ितों के हितों का.प्रतिनिधित्व करना चाहती है. प्रार्थना पत्र में यह भी कहा गया है कि वैवाहिक बलात्कार से संबंधित कानूनी प्रावधान की संवैधनिकता और सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक परिस्थितियों पर राज्य अपना दृष्टिकोण पेश करना चाहता है. वर्तमान में इस कानून के मुताबिक अगर पति अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है, बशर्ते वह 15 साल से कम उम्र की न हो, तो यह बलात्कार नही है.
वही 1 जुलाई से आईपीसी की धारा 63 के अपवाद 2 में कहा गया है कि किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ संभोग या अन्य यौन कृत्यों को बलात्कार नही माना जाएगा जबतक की पत्नी 18 वर्ष से कम न हो. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि मैरिटल रेप अपराध है या नही. भारतीय कानून में मैरिटल रेप कानूनी अपराध नही है. इसे अपराध घोषित करने की मांग को लेकर कई संगठनों की मांग लंबे अरसे से जारी है.
दिल्ली हाइकोर्ट में आईपीसी की धारा 375 (दुष्कर्म) के तहत वैवाहिक दुष्कर्म को अपवाद माने जाने को लेकर संवैधनिकता तौर पर चुनौती दी गई. बता दें कि साल 2011 अगस्त में केरल हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा था कि भारत में मैरिटल रेप के लिए सजा का प्रावधान नहीं है. लेकिन इसके बावजूद ये तलाक का आधार हो सकता है. हालांकि केरल हाई कोर्ट ने भी मैरिटल रेप को अपराध मानने से इंकार कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि मैरिटल रेप या वैवाहिक बलात्कार भारत में अपराध नहीं है.
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-भारत एक्सप्रेस
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