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मुस्लिम महिलाओं में बहुविवाह खत्म करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं में बहुविवाह प्रथा को समाप्त करने और इसे दंडनीय अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से बुजुर्गों की सुविधाओं पर स्टेटस रिपोर्ट मांगी.

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं में बहुविवाह प्रथा को खत्म करने और इसे अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. यह याचिका भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन सहित अन्य की ओर से दायर की गई है.

दायर याचिका में मांग की गई है कि मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुविवाह को पूरी तरीके से गैर कानूनी घोषित किया जाए साथ ही इसे दंडनीय बनाया जाए. दायर याचिका में मांग की गई है कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, जिन्हें पति दूसरी शादी के बाद छोड़ देते हैं.

याचिकाकर्ता का कहना है कि समान नागरिक संहिता केवल बहुविवाह पर रोक लगाने जैसी सीमित पहल करती है, जबकि जमीनी स्तर की समस्याओं का व्यापक समाधान नही करती. याचिका में मुस्लिम महिलाओं के लिए एक संशोधित मुस्लिम कोड लागू करने की मांग की गई है., जिसके तहत विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण हो तथा महिलाओं के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा मिले.

सर्वे में महिलाओं के अधिकारों पर उठा गंभीर सवाल

बीएमएमए की सह संस्थापक जकिया सोमन ने दायर याचिका में संगठन के सर्वे का हवाला दिया है. रिपोर्ट के अनुसार बहुविवाह का शिकार 2500 मुस्लिम महिलाओं के अध्ययन में 85 फीसदी महिलाओं ने बहुविवाह को समाप्त करने, 87 फीसदी ने इसे अपराध घोषित करने और 93 फीसदी ने बाल विवाह पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 79 फीसदी पहली पत्नियों को पति की दूसरी शादी की जानकारी तक नही दी गई, जबकि 88 फीसदी मामलों में उनकी सहमति भी नहीं ली गई. 54 फीसदी महिलाओं को दूसरी शादी के बाद पति ने छोड़ दिया और 36 फीसदी महिलाओं को अपने और बच्चों के लिए कोई आर्थिक सहायता नही मिली.

सर्वे के मुताबिक करीब 50 फीसदी महिलाओं ने गंभीर मानसिक आघात, अवसाद और आत्महत्या जैसे विचारों का सामना करने की बात कही. 77 फीसदी महिलाएं स्कूल छोड़ चुकी थी और 43 फीसदी के पास आय का कोई साधन नही है. याचिका में यह भी कहा गया है कि बहुविवाह इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और कई मुस्लिम देशों ने इस पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगा रखा है. इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर इस प्रथा को संरक्षण नहीं दिया जा सकता.

याचिका में यह भी कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन एक्ट 1937 की धारा 2 मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक विवाह की अनुमति देती है, जिससे मुस्लिम महिलाओं को समानता और गरिमा के संवैधानिक अधिकारों से वंचित होना पड़ता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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