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धर्मांतरण विरोधी कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; राजस्थान समेत 12 राज्यों को नोटिस जारी, 4 हफ्ते में मांगा जवाब

धर्मांतरण विरोधी कानून को चुनौती देने वाली नई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 12 राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई तीन जजों की बेंच करेगी और अगली सुनवाई मार्च में होगी.

धर्मानान्तरण विरोधी कानून को लेकर दायर नई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 12 राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिसा, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, झारखंड, उत्तराखंड, हरियाणा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है.

कोर्ट मार्च में इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. कोर्ट ने यह नोटिस राजस्थान सरकार द्वारा लाए गए कानून के खिलाफ दायर याचिका पर यह नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि मामले में तीन जजों की बेंच सुनवाई करेगा. मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि इसी तरह की याचिका पहले से कोर्ट में लंबित है. हमारा जवाब तैयार है हम जल्द दाखिल कर देंगे. नेशनल काउंसिल का चर्चेज इन इंडिया नामक संस्था की ओर से दायर की है.

ओडिशा और राजस्थान के कानूनों को चुनौती नहीं दी गई- याचिकाकर्ता

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट को बताया कि ओडिशा और राजस्थान के कानूनों को चुनौती नहीं दी गई है. अन्य अधिनियमों में भी संशोधन हैं, जिन्हें चुनौती दी गई है. राजस्थान गैरकानूनी धार्मिक धर्मांतरण निषेध अधिनियम 2025 के प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है. इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए कानून को चुनौती देने वाली याचिका में आरोप लगाया गया है कि धर्म परिवर्तन कानून संविधान 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 ( जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है.

सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

याचिका में यह भी कहा गया है कि अधिनियम की धारा 2 और 3 अस्पष्ट बहुत व्यापक और स्पष्ट मानकों की कमी है. जिससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि अपराध क्या है. याचिका में कहा गया है कि यह अस्पष्टता वाक स्वतंत्रता और धार्मिक प्रचार का हनन करती है, जिससे मनमाने और भेदभावपूर्ण तरीके से इसेलागू किया जाना संभव हो जाता है. जबकि दंडनीय कानून सटीक होने चाहिए. अस्पष्ट प्रावधान अधिकारियों को अत्यधिक विवेकाधिकार प्रदान कर और निर्दोष व्यक्तियों के खिलाफ गलत तरीके से मुकदमा चलाने का जोखिम मोल लेकर संवैधानिक सिद्धांतो का उल्लंघन है.

याचिका में कहा गया है कि मुख्य चिंता यह है कि 2024 का संशोधन प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को शामिल किए बिना शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत व्यक्तियों की श्रेणी का विस्तार करता है. बता दें कि धर्मांतरण विरोधी कई याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

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-भारत एक्सप्रेस



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