सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग के साथ रोजगार में होने वाले भेदभाव को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि इस कानून के तहत दिव्यांगजनों को दिए गए अधिकारों और सुविधाओं का पालन सुनिश्चित करने के लिए अब निगरानी एक संगठित और संस्थागत ढांचे के तहत की जाएगी. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की मांग वाली याचिका पर यह फैसला दिया है.
कोर्ट ने केंद्र सरकार से दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण व्यवस्था पर कुछ अहम प्रश्न पूछे हैं. कोर्ट ने केंद्र सरकार से 14 अक्टूबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि प्रोजेक्ट एबिलिटी एम्पावरमेंट नाम और शैली के तहत एक राष्ट्रीय निगरानी तंत्र बनाया जाए. कोर्ट ने इस परियोजना की जिम्मेदारी देश भर के 8 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों को सौंपी गई है. ये संस्थान अधिनियम के तहत व्यवस्था का मूल्यांकन करेंगे और उसके सुचारू प्रबंधन को सुनिश्चित करेंगे.
न्यायपालिका की ऐतिहासिक पहल
सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने में रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि परियोजना के तहत विस्तृत रिपोर्ट छह महीने में दाखिल किया जाए. रिपोर्ट में यह बताया जाए कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम का विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कितना पालन किया गया है, और सुधार की गुंजाइश है क्या? कोर्ट ने यह भी कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम केवल कागजों तक सीमित न रहे, इसके लिए सख्त और पारदर्शी निगरानी जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा करना संवैधानिक अधिकार है, इस दिशा में कोई लापरवाही बर्दाश्त नही की जाएगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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