राजनीतिक लड़ाई के लिए सीबीआई का हो रहे इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड विधानसभा नियुक्ति सीबीआई जांच से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई से पूछा कि राजनीतिक लड़ाई के लिए उसका इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है? सीजेआई बी आर गवई ने यह टिप्पणी की है. सीजेआई बी आर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सीबीआई की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें प्रारंभिक जांच शुरू करने की मांग की थी.
सीजेआई गवई ने अर्जी को खारिज करते हुए कहा कि राजनीतिक लड़ाई के लिए आप (सीबीआई) अपनी मशीनरी का इस्तेमाल क्यों कर रही है? उन्होंने सीबीआई से यह भी कहा कि इससे पहले भी कई बार इसको लेकर आगाह किया गया है. मामले की सुनवाई के दौरान झारखंड विधानसभा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि यह मामला राजनीति से प्रेरित है. जब भी इस तरह के मुद्दे आते हैं, सीबीआई बिना कारण बीच में कूद पड़ती है. उन्होंने यह भी कहा कि विधानसभा की याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट पहले ही सीबीआई जांच पर रोक लगा चुकी है. इसलिए का इस मामले में आगे बढ़ने का कोई आधार नहीं है. वही सीबीआई की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा इस मामले में ऐसा नही हैं.
CBI की प्रारंभिक जांच पर उठा सवाल
इसपर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि केवल यही नहीं, पश्चिम बंगाल में भी कई मामलों में मानवीय न्यायाधीशों ने इसे देखा है. झारखंड हाई कोर्ट ने नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश दिया था. जिसके खिलाफ झारखंड विधानसभा ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. याचिकाकर्ता के वकील के मुताबिक हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने मामले की प्रारंभिक जांच शुरू कर दी थी. झारखंड हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका में कहा गया था कि विधानसभा में अवैध नियुक्तियां हुई है.
विधानसभा में अवैध भर्तियों की पोल खुली
इस मामले में याचिकाकर्ता शिव शर्मा ने आरोप लगाया था कि झारखंड विधानसभा में वर्ष 2005-2007 के बीच हुई नियुक्तियों में गड़बड़ी हुई है. इस मामले की जांच के लिए जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद आयोग का गठन किया था. लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नही हुई है. आयोग ने करीब 10 साल बाद वर्ष 2018 में राज्यपाल को जांच पूरी करके अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इसके बाद राज्यपाल ने विधानसभा अध्यक्ष को कार्रवाई का निर्देश भी दिया था. बता दें कि झारखंड के पहले विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में 274 लोगों को नौकरी पर रखा गया था.
इसके बाद स्पीकर आलमगीर आलम के कार्यकाल में 324 और नियुक्तियां की गई. आरोप है कि विधानसभा अध्यक्ष शशांक शेखर भोक्ता ने भी गलत तरीके से लोगों को प्रमोशन दिया. याचिकाकर्ता का कहना है कि स्पीकर मामले को लंबा खींच रहे है. मामले में देरी होने से गलत तरीके से चुने गए अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाएंगे.
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भारत एक्सप्रेस
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