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कर्नाटक में विधायकों को कैबिनेट रैंक का विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने नहीं की सुनवाई, जानें क्या है अनुच्छेद 164 (1A) का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में 42 विधायकों और एमएलसी (MLC) को कैबिनेट रैंक दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने की सलाह दी है.

Supreme Court order

कर्नाटक में विधायकों और एमएलसी को कैबिनेट का दर्जा दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है. साथ ही कोर्ट ने कर्नाटक सरकार के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है, जिसमें विधायकों और एमएलसी सहित 42 विधायकों को विभिन्न बोर्डों और निगमों के प्रमुख के रूप में कैबिनेट रैंक दी गई थी. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी है कि वह कर्नाटक हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करें. यह याचिका कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कार्यरत बेंगलुरु निवासी सूरी पायला ने दायर की थी.

‘कैबिनेट का दर्जा लाभ के पद के समान’

पायला की दलील थी कि इन विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिए जाने से उन्हें उच्च वेतन, सरकारी वाहन, ड्राइवर, ईंधन भत्ता, मकान किराया भत्ता और चिकित्सा प्रतिपूर्ति जैसे वित्तीय लाभ मिलते हैं. उन्होंने कहा कि यह लाभ का पद धारण करने के समान है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 191 का उल्लंघन है, जो विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को ऐसे पद धारण करने के लिए अयोग्य ठहराने का प्रावधान है.

याचिकाकर्ता के वकील की दलील थी कि ऐसे व्यक्तियों को कैबिनेट रैंक देने का निर्णय संविधान के अनुच्छेद 164 (1A) के अध्यादेश के खिलाफ है. यह अनुच्छेद मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित करता है. याचिकाकर्ता की दलील थी कि इसका उद्देश्य अनुचित सरकारी विस्तार को रोकना और विधायी अखंडता को बनाए रखना है.

42 विधायकों को कैबिनेट रैंक और संवैधानिक चुनौती

राज्य सरकार ने 26 जनवरी 2025 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें 34 अतिरिक्त विधायकों को कैबिनेट रैंक दिया गया था, कुल 42 ऐसे हैं. इस कार्रवाई की अधिसूचना के माध्यम से सरकार के आकार को बढ़ाने की क्षमता के लिए की गई है. इससे पहले हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियुक्तियों की व्यापक प्रकृति पर सवाल उठाया, जो एक ही सरकारी अधिसूचना से स्पष्ट हो गई.

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दायर जनहित याचिका में इन नियुक्तियों को कई संवैधानिक आधारों पर चुनौती दी गई थी. जिसमें अनुच्छेद 102, 191 और 164 के संभावित उल्लंघन के साथ-साथ कर्नाटक विधानमंडल (अयोग्यता निवारण) अधिनियम 1956 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 10 शामिल हैं.



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