सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जनजाति (ST) को मिलने वाली आयकर छूट के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है. यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर की गई थी. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों में कई ऐसे संपन्न लोग हैं, जिनकी आय करोड़ों रुपए में है, लेकिन वे अब भी अनुसूचित जनजाति के नाम पर कर (टैक्स) छूट का लाभ ले रहे हैं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि कुछ लोग बड़े शैक्षणिक संस्थान चला रहे हैं और सालाना सैकड़ों करोड़ रुपए कमाने के बावजूद टैक्स नहीं देते.
समुदाय पर शक नहीं कर सकते’ – सीजेआई
याचिका पर टिप्पणी करते हुए सीजेआई (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि यदि कुछ लोगों ने किसी प्रावधान का दुरुपयोग किया है, तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरे समुदाय पर संदेह किया जाए. कोर्ट ने याचिकाकर्ता से साफ कहा कि यह मामला एक नीतिगत (पॉलिसी) मामला है, इस पर संसद और सरकार को निर्णय लेना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय को सुझाव दिया है कि वे अपनी मांग संसद की संबंधित समिति और केंद्र सरकार के समक्ष रख सकते हैं. इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने की कोर्ट से अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार करते हुए अदालत ने मामले का निपटारा कर दिया है. साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के समक्ष ज्ञापन देने को कहा है.
समान प्रतिस्पर्धा की दी थी दलील
दायर याचिका में आयकर अधिनियम 2025 के तहत अनुसूचित जनजातियों को दी गई कर छूट पर ‘क्रीमी लेयर’ व्यवस्था लागू करने की मांग की गई थी. याचिकाकर्ता का कहना था कि बिना किसी आय सीमा के दी गई यह कर छूट मनमानी, अव्यवहारिक और संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 19 (1)(g), अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 27 का उल्लंघन है.
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दायर याचिका में यह भी तर्क दिया गया था कि अमीर और गरीब अनुसूचित जनजाति व्यक्तियों के बीच कोई भेद न करने से बाजार में असमान प्रतिस्पर्धा पैदा हो रही है; क्योंकि गैर-एसटी (Non-ST) व्यापारी पूरी तरह कर चुकाते हैं, जबकि समान व्यापार करने वाले कर-मुक्त प्रतिस्पर्धियों को अतिरिक्त लाभ मिलता है.
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