सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पीलीभीत समाजवादी पार्टी के कार्यालय के लिए आवंटित जमीन को रद्द करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है. जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की अवकाशकालीन पीठ ने यह आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि याचिका दायर करने में 988 दिन की देरी हुई है, लिहाजा सुनवाई नही हो सकती है.
सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले की वैधता पर सवाल उठाया गया था, जिसमें समाजवादी पार्टी के तत्कालीन पीलीभीत जिला अध्यक्ष द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया गया था और आदेश दिया गया था कि उसी कारण से नई याचिका दायर करने की कोई स्वतंत्रता नहीं दी जाएगी.
समाजवादी पार्टी की ओर से दायर एसएलपी में कहा गया था कि उस समय के पीलीभीत जिला अध्यक्ष ने यह याचिका पार्टी की ओर से नही बल्कि व्यक्तिगत रूप से दायर की थी, उन्हें पार्टी की तरफ से कोई निर्देश नहीं था. ऐसे में पार्टी का पक्ष सही तरीके से कोर्ट के सामने नहीं रखा गया. साथ ही यह भी कहा गया था कि समाजवादी पार्टी पीलीभीत नगर पालिका परिषद के गलत तरीके से लिए गए अचानक लिए गए और अवैध फैसलों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का इरादा रखती है, लेकिन ऐसा नहीं कर सकती, क्योंकि विवादित फैसला उसे आवंटन रद्द करने के मामले में नई याचिका दायर करने से रोकता है.
अधिकारी ने राजनीतिक दबाव में आकर लिया फैसला
याचिका में यह भी कहा गया था कि उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दिया गया और ना ही संबंधित तथ्यों और कानूनों को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया गया. पार्टी का कहना था कि वे लगातार किराया जमा कर रहे थे और जनवरी 2021 तक का भुगतान किया जा चुका है. याचिका में कहा गया था कि अधिकारी ने राजनीतिक दबाव में आकर यह फैसला लिया है.
भारी फोर्स के साथ पहुंचे पुलिस प्रशासनिक अधिकारी
बता दें कि 10 जून को नगरपालिका की ओर से अपने ईओ आवास को खाली कराने के लिए प्रयास किए गए थे. इसका नोटिस पूर्व में ही सपा कार्यालय के बाहर चस्पा कर दिया गया था. भारी फोर्स के साथ पहुंचे पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों और सपा नेताओं के बीच चार घंटे चली जद्दोजहद के बाद छह दिन का समय दे दिया गया था.
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के मुताबिक साल 2020 में पार्टी को पीलीभीत नगर पालिका परिषद द्वारा कार्यालय हेतु जगह आवंटित की गई थी, और कब्जे का पत्र भी दिया गया था. लेकिन बाद में नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी ने आदेश जारी कर कहा कि यह आवंटन नियमों के अनुसार नहीं हुआ और कई प्रक्रियाएं जैसे कि सार्वजनिक नीलामी और रजिस्ट्रेशन नहीं हुई.
-भारत एक्सप्रेस
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