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सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक अधिकारियों को दो टूक, व्यक्तिगत मामलों में बार-बार याचिका दाखिल करने से बचें

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की ओर से व्यक्तिगत सेवा मामलों में बार-बार याचिकाएं दाखिल करने पर कड़ी टिप्पणी की.. CJI सूर्यकांत ने न्यायिक कामकाज पर ध्यान देने की बात कही.

ओडिशा में डीजीपी नियुक्ति में नियमों की अनदेखी के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई.

(सुप्रीम कोर्ट)

Edited by Sahil Singh

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की ओर से अपनी सेवा संबंधी व्यक्तिगत समस्याओं और राहत की मांग को लेकर बार-बार अलग-अलग याचिकाएं दाखिल करने पर कड़ी टिप्पणी की है. ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन समेत अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को अपने न्यायिक कामकाज पर ध्यान देना चाहिए, न कि व्यक्तिगत अर्जियों के सिलसिले में बार-बार अदालत के गलियारों में घूमते रहना चाहिए.

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों, वेतन, भत्तों, पेंशन और अन्य संबंधित मुद्दों पर सुनवाई कर रही है.

‘न्यायिक कामकाज पर ध्यान दें’

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि न्यायिक अधिकारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी न्यायिक कार्य करना और मामलों का निपटारा करना है. उन्होंने कहा कि सेवा से जुड़ी व्यक्तिगत समस्याओं या शर्तों को लेकर बार-बार अलग-अलग आवेदन दाखिल करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए. सीजेआई ने कहा, “न्यायिक कामकाज पर ध्यान देने के बजाय वे कोर्ट के गलियारों में घूम रहे हैं.”

यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई, जिनमें न्यायिक अधिकारियों की ओर से व्यक्तिगत राहत की मांग की गई है.

वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने रखा पक्ष

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कोर्ट की टिप्पणी पर स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारी अपना नियमित न्यायिक काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अधिकारियों की ओर से उनके वकील अदालत में पेश हो रहे हैं और इसे इस तरह नहीं देखा जाना चाहिए कि न्यायिक अधिकारी खुद अपने न्यायिक दायित्वों से हटकर अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं.

विकास सिंह ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को अदालतों में आने वाले वकीलों के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे अपने नियमित न्यायिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं.


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रिटायरमेंट की उम्र पर भी हुई थी सुनवाई

न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां कर चुका है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने निचली अदालतों के न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के मुद्दे पर राज्यों से पुनर्विचार करने को कहा था.

कोर्ट ने कहा था कि न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का विरोध करने के लिए राज्य वित्तीय बोझ का हवाला नहीं दे सकते. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को सेवा में बनाए रखना कई बार उन्हें सेवानिवृत्त करने और खाली पदों को नए अधिकारियों से भरने की तुलना में कम वित्तीय बोझ वाला विकल्प हो सकता है.

राज्यों को दो हफ्ते में फैसला लेने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के मुद्दे पर दोबारा विचार करने को कहा था. अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया था कि वे जल्द से जल्द बेहतर और व्यावहारिक फैसला लें और इस संबंध में करीब दो हफ्ते के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करें.

-भारत एक्सप्रेस



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