भ्रष्टाचार के मामले में बर्खास्त मध्य प्रदेश के अतिरिक्त जज निर्भय सिंह सुलिया को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुलिया की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने बकाया वेतन देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की सेवा सेवानिवृति की उम्र तक जारी रहेगा. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायाधीश के खिलाफ केवल कथित तौर पर गलत या त्रुटिपूर्ण न्यायिक आदेश पारित करने के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नही की जा सकती.
निर्भय सिंह सुलिया पर 2014 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में सेवा करते हुए भ्रष्टाचार के आरोपों और आबकारी अधिनियम के तहत जमानत याचिकाओं पर फैसला देने में दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगा था. इसके बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जांच रिपोर्ट और जांच अधिकारी के निष्कर्षों की बारीकी से जांच करने पर हमारा विचार है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप है कि उसने कुछ आवेदकों को मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 59 A के प्रावधानों पर विचार किए बिना जमानत दे दी थी और अन्य मामलों में यह प्रावधान को लागू करने के बाद जमानत याचिका खारिज कर दिए गए थे और जांच का निष्कर्ष है कि आरोपी साबित हुआ था, जो ठोस तर्क पर आधारित है.
कारण बताओ नोटिस से शुरू हुआ जज सुलिया का विवाद
निर्भय सिंह सुलिया को 31 अक्टूबर 1987 को द्वितीय श्रेणी के सिविल जज के रूप में नियुक्त किया गया था, और बाद में उन्हें मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और फिर मई 2011 में खरगोन में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर पदोन्नति किया गया. 12 अगस्त 2011 को शिकायतकर्ता ने मध्य प्रदेश उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत जमानत याचिकाओं के निपटान में याचिकाकर्ता द्वारा भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज की थी.
मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम 1966 के नियम 14 के तहत 13 मई 2023 को याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था.
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-भारत एक्सप्रेस
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