सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की चयन की प्रक्रिया सूचना के अधिकार (RTI) और न्यायिक समीक्षा के बाहर है. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी साफ कर दिया है कि जजों की चयन प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है.
कॉलेजियम का फैसला उसकी समझ और संतुष्टि पर आधारित: जस्टिस नागरत्ना
जकस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि कॉलेजियम का फैसला उसकी समझ और संतुष्टि पर आधारित होता है और न तो हाई कोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट किसी सिफारिश को लेकर याचिकाएं सुनकर या निर्देश जारी कर कोई कमी निकाल सकता है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हम कोई ऐसी स्थिति पैदा नहीं करना चाहते हैं, जिससे नई मुसीबत खड़ी हो. कोर्ट ने कहा कि वह कॉलेजियम के फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है.
अदालत ने यह भी कहा कि कुछ उम्मीदवारों को चुनने और उनके नामों की सिफारिश करने से पहले सैकड़ों उम्मीदवारों को बातचीत के लिए बुलाया जाता है. कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज अरविंद मल्होत्रा को राहत देने से इनकार करते हुए यह फैसला दिया है. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई अधिकारी वरिष्ठ है, उसे हाई कोर्ट जज बनाए जाने का अधिकार नहीं मिल जाता. कोर्ट ने कहा कि कॉलेजियम की सिफारिशों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित है.
जूनियर अफसरों को तरजीह देने का आरोप
न्यायिक अधिकारी का आरोप है कि हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए उनसे जूनियर अधिकारियों के नाम आगे बढ़ा दिए गए हैं, जबकि उनके मामले पर विचार नहीं किया गया. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील बलवीर सिंह ने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले उनके मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था, लेकिन उस निर्देश का पालन नहीं हुआ. उन्हें सितंबर 2025 में बातचीत के लिए बुलाया गया था, और कुछ दस्तावेज व जानकारियां जमा करने को कहा गया था. हालांकि, उन दस्तावेजों का इंतजार किए बिना ही दो जूनियर अधिकारियों के नाम पदोन्नति के लिए अनुशंसित कर दिए गए.
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इस पर जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि क्या मामले को वापस भेजे जाने के बाद कोई कार्रवाई की गई? याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि उनके द्वारा मांगी गई जानकारी बाद में जमा की गई, लेकिन उससे पहले ही सिफारिशें कर दी गईं. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि फिलहाल याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को खारिज किया गया है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि कॉलेजियम ने उनके बारे में क्या विचार किया.
वहीं जस्टिस बागची ने कहा कि यदि शिकायत केवल हाई कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश तक सीमित होती तो बात अलग थी, लेकिन अब उस पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश भी आ चुकी है. ऐसे में हाई कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर नहीं, बल्कि बाद की प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है.
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