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नॉर्थ ईस्ट के लोगों से भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, MHA कमेटी को दिए कड़े निर्देश

देश में पूर्वोत्तर (North East) के लोगों के साथ हो रहे नस्लीय भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है. कोर्ट ने गृह मंत्रालय की मॉनिटरिंग कमेटी को हर 3 महीने में बैठक करने और स्वतः संज्ञान लेने के निर्देश दिए हैं. पढ़ें पूरी खबर

Supreme Court Hate Speech Hearing

देश के अलग-अलग राज्यों में रह रहे नॉर्थ ईस्ट के लोगों के साथ हो रहे नस्लीय भेदभाव और हिंसा की घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है. कोर्ट ने गृह मंत्रालय द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी को निर्देश दिया है कि वह कम से कम हर तीन महीने में एक बार बैठक करें. जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के . विनोद चंद्रन की पीठ ने यह आदेश दिया है.

कोर्ट ने यह आदेश वर्ष 2015 में दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया है. जिसमें नॉर्थ-ईस्ट के पूर्व के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई थी.

स्वतः संज्ञान लेना चाहिए

कोर्ट ने कहा है कि समिति को किसी भी समाचार पत्र में प्रकाशित नस्लीय भेदभाव से जुड़ी खबरों पर भी स्वतः संज्ञान लेना चाहिए. यदि समिति का कोई सदस्य किसी गंभीर मामले की जानकारी देता है, तो तत्काल बैठक बुलाकर आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाएं. साथ ही अदालत ने समिति को 15 मार्च को बैठक बुलाने को कहा है. साथ ही कोर्ट ने समिति में उठाए गए मुद्दे और सुलझाए गए. मुद्दों से संबंधित स्थिति रिपोर्ट अदालत में पेश करने को कहा है.

गृह मंत्रालय द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी की अध्यक्षता संयुक्त सचिव कुमार बंसोड़ कर रहे है. समिति में कुल 12 सदस्य है. यह समिति कर्मा दोर्जी की ओर से दायर याचिका पर 2014 में दायर की गई है.

उत्तराखंड से सामने आया था मामला

हालही में उत्तराखंड के देहरादून में त्रिपुरा के छात्र पर हुए हमले के बाद हुई मौत के मामले में दायर जनहित याचिका का सुप्रीम कोर्ट ने निपटारा कर दिया था. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि जनहित याचिका में उठाए गए सवाल काफी अहम है, लिहाजा संबंधित अथॉरिटी के पास ज्ञापन दे. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कहा कि अटॉर्नी जनरल के समक्ष ज्ञापन देने को कहा था, और एजी इसको सरकार को भेजेंगे.

दाखिल जनहित याचिका में पूर्वोत्तर राज्यों के खिलाफ नस्लीय हिंसा से निपटने में संवैधानिक विफलता की न्यायिक जांच की मांग की गई थी. दाखिल जनहित याचिका में कहा गया था कि यह मामला भारत के संवैधानिक अधिकारों के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 (1)(A) व (G) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताया था. याचिका में कहा गया था कि एंजेल चकमा ने हमले के समय सवाल पूछते हुए कहा था कि हम भारतीय है इसके लिए हमें कौन सा सर्टिफिकेट दिखाना होगा.



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