एलएलएम कोर्स की अवधि से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सवाल उठाते हुए कहा कि बीसीआई को लॉ कॉलेनों के पाठ्यक्रम आदि का फैसला क्यों करना चाहिए? बीसीआई ने कहा कि बार काउंसिल से सभी हितधारकों की राय लेने और राय बनाने के लिए कहा गया था. उसपर अलग-अलग राय थी. अब इसपर विचार करने के लिए पूर्व सीजेआई की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है.
कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी से मांगा विस्तृत हलफनामा
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार और यूजीसी से विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है. साथ ही ने अटॉर्नी जनरल से कोर्ट को सहायता करने को कहा है. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बीसीआई के पास प्रशिक्षण प्रदान करने की एक कठिन जिम्मेदारी है. विश्वविद्यालयों की सेवाओं को काम पर रखने की आवश्यकता हो सकती है, क्योंकि इसे पूरे भारत में होना चाहिए. इसे उत्तर पूर्व, दक्षिण में भी होना चाहिए. आप मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया, मामले से संबंधित कानून का हवाला देने आदि पर प्रशिक्षण ले सकते हैं और यह आपकी वैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए.
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बीसीआई को खुद निभानी होगी अपनी जिम्मेदारी
बीसीआई ने कोर्ट को बताया कि यह प्रणाली लागू है और कानून में भी है. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कानूनी शिक्षा में न्यायपालिका प्राथमिक हितधारक है. हमें किस तरह के अधिकारी मिल रहे हैं. क्या वे आम आदमी की दुर्दशा को समझते हैं या सिर्फ यांत्रिक निर्णय देते हैन शिक्षाविद इस पर गौर कर सकते हैं. बीसीआई को अपनी जिम्मेदारी खुद निभानी होगी, हमारे देश में वकीलों की संख्या देखिए. कोर्ट ने कहा कि आप वकीलों की वैश्विक पहचान चाहते हैं.ऐसे में जरूरी है कि लॉ कॉलेजों के निरीक्षण करने के बजाए उस पर ध्यान दें.
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