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यूपी गैंगेस्टर एक्ट के संविधान वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ करेगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट 1986 के कड़े प्रावधानों की जांच करने को तैयार है. कोर्ट ने सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़कर 3 जजों की बेंच को मामला सौंप दिया है.

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Edited by Vaibhav Gupta

UP Gangster Act: उत्तर प्रदेश गैंगेस्टर एवं समाज विरोधी गतिविधयां (रोकथाम) अधिनियम 1986 को कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार हो गया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में तीन जजों की बेंच सुनवाई करेगी. साथ ही कोर्ट ने सभी याचिकाओं को एक साथ संलग्न कर दिया है.

सभी याचिकाओं को क्लब करना जरूरी

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि देश भर के अदालतों में इसको लेकर दायर अलग-अलग याचिकाओं को क्लब कर एक साथ सुनना जरूरी है. ताकि एक समान और स्पष्ट फैसला आ सकें.

कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी मामले में पक्षकार बनाया है. यह कानून 1986 में बनाया गया था, जिसका उद्देश्य यूपी में संगठित अपराध, डकैती और असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगाना है.

क्या है कानुन बनाने का मुख्य मकसद?

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली जैसे राज्यों में भी संगठित अपराध से निपटने के लिए इसी तरह के कानून बनाए गए हैं. कानून बनाए जाने का मुख्य मकसद अपराधी नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई करना और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय बनाना है.

मामले की सुनवाई के दौरान याचिककर्ताओ का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील शोएब आलम ने विभिन्न पीठों में लंबित मामले के दोहराव को लेकर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि जहां एक ओर जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. वी विश्वनाथन की पीठ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 111 की जांच कर रही हैं, जो संगठित अपराध से संबंधित है.

यूपी गैंगेस्टर एक्ट के प्रावधानों को चुनौती

दूसरी ओर इस याचिका में उत्तर प्रदेश गैंगेस्टर अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती दी गई है. इसके अलावा कार्यवाही के दौरान ‘बेंच हंटिंग’ यानी मनपंसद बेंच चुनने का मुद्दा भी सामने आया, लेकिन याचिककर्ताओ ने इस आरोप को खारिज किया. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य केवल कानून के संवैधानिक पहलुओं की जांच कराना है.

उन्होंने ये भी कहा कि जुलाई 2025 में अधिनियम से जुड़ी एक याचिका को पिछली बार खारिज किया जाना कोई कानूनी मिसाल या मर्जर नहीं था क्योंकि गुण-दोष पर विस्तृत फैसला दिए बिना ही उसे सीधे खारिज कर दिया गया था.

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-भारत एक्सप्रेस



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