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स्मगलिंग के मामले में आरोपियों को 41 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोषी करार दिया

41 साल पुराने घड़ी तस्करी मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला. शीर्ष अदालत ने आरोपियों को दोषी तो करार दिया, लेकिन उनकी बढ़ती उम्र और मामले की लंबी अवधि को देखते हुए दोबारा जेल भेजने से इनकार कर दिया.

Supreme Court of India on UCC
Edited by Vaibhav Gupta

सुप्रीम कोर्ट ने 41 साल बाद स्मगलिंग (Smuggling) के मामले में तीन आरोपियों को दोषी करार दिया है, लेकिन कोर्ट ने तीनों की उम्र को.देखते हुए जेल भेजने से इनकार कर दिया है. यह केस 1985 का है. जो 777 विदेशी घड़ियों की अवैध तस्करी से जुड़ा हुआ है. उस दौरान विदेशी इलेक्ट्रॉनिक समान, खासकर खाड़ी देशों से लाए जाने वाले प्रोडक्ट्स की तस्करी आम बात थी.

41 साल के सुनवाई के बाद फैसला

जब्त 777 घड़ियों में Seiko, Citizen और Ricoh जैसी विदेशी कंपनियों के ब्रांड शामिल है. यह मामला गुजरात से जुड़ा हुआ है. गुजरात के भूंज कोर्ट के निचली अदालत ने 18 साल तक सुनवाई की थी, वहीं, सेंशन कोर्ट ने दो साल और गुजरात हाई कोर्ट ने 5 साल तक सुनवाई कि, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल तक सुनवाई की. यानी कुल 41 साल के सुनवाई के बाद यह फैसला आया है.

सुप्रीम कोर्ट ने दोषी करार देते हुए कहा कि मामला चार दशक पुरानी है. केस लंबे समय से कोर्ट ने लंबित रहा है. आरोपियों ने पहले ही जेल की सजा काटी है. बचे हुए आरोपियों की उम्र ज्यादा है. लिहाजा जेल नही भेजा जा सकता है.

हाई कोर्ट ने सही किया: SC

कोर्ट ने अपने फैसले में पहले ही स्पष्ट किया है कि तीनों को दोबारा जेल भेजना अत्यधिक सख्त होगा. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि मौजूदा हालात को देखते हुए, आरोपियों की सजा उतनी ही रखी जाए, जितनी उन्होंने काटी है. आरोपी तीन साल जेल में बिता चुके है.

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के उनके दोषी ठहराए जाने के आदेश को बरकरार रखा है. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि गुजरात हाई कोर्ट के फैसले से सहमत है. कोर्ट ने आगे ये भी कहा कि निचली अदालत द्वारा दिए गए फैसले को हाई कोर्ट द्वारा सही ठहराना सही है.  हाई कोर्ट ने कोई गलत काम नहीं किया. इसलिए इस कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत दखल देने की आवश्यकता नहीं है.

7 साल बाद अपील हुई खारिज

बता दें कि 2003 में भूंज के निचली अदालत ने आरोपियों को दोषी करार दिया था, जिसके खिलाफ दोषियों ने गुजरात हाई कोर्ट का रुख किया था. गुजरात हाई कोर्ट ने 7 साल बाद उनकी अपील को खारिज कर दिया था और निचली अदालत द्वारा सुनवाई गई तीन साल की सजा को बरकरार रखा था. इसके बाद 2011 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुचा था. जिसपर सुनवाई के बाद कोर्ट ने यह फैसला दिया है.

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-भारत एक्सप्रेस



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