Bharat Express DD Free Dish
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital

महिला जज के गरिमा के ठेस पहुंचाने के मामले में सुनाई गई सजा को हाई कोर्ट ने रखा बरकरार

दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला जज के प्रति अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने वाले वकील की सजा कम करने से इनकार किया. कोर्ट ने कहा, यह न्यायपालिका पर हमला है, न कि केवल व्यक्तिगत दुर्व्यवहार.

Quentin Deacon Drug Case
Edited by Akansha

अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल कर एक महिला जज के गरिमा के ठेस पहुचाने के मामले में सुनाई गई सजा को कम करने से दिल्ली हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया है. उसने कहा कि लिंग विशिष्ट अपशब्दों के माध्यम से किसी जज को धमकाने या डराने वाला कोई भी कृत्य न्याय पर हमला है. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि यह महज व्यक्तिगत दुर्व्यवहार का मामला नही है, बल्कि ऐसा मामला है जहां न्याय के साथ अन्याय हुआ है.

महिला जज बनी हमले का निशाना

जहां कानून की निष्पक्ष आवाज की प्रतीक एक जज अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय व्यक्तिगत हमले का निशाना बनी. यह अत्यंत चिंता का विषय है कि कभी-कभी जज भी लैंगिक दुर्व्यवहार से मुक्त नहीं रह पाते. जब एक महिला जज के साथ अदालत के एक अधिकारी जैसे वकील व्यक्तिगत अपमान और निरादर करता है तो यह न केवल एक व्यक्तिगत अन्याय को दर्शाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि महिलाएं आज भी न्याय व्यवस्था के उच्चतम स्तरों पर भी एक प्रणालीगत असुरक्षा का सामना करती हैं.

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कही ये बात

कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए आरोपी वकील को पहले ही जेल में बिताई गई पांच महीने की अवधि को सजा के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया. साथ ही सजा के फैसले में संशोधन कर सभी धाराओं के तहत मिली. सजा को एक साथ चलाने को कहा. अगर निचली अदालत के अनुसार कर्मानुसार सजाएं भुगतनी पड़ती तो यह लगभग दो साल हो जाता है.

वकील को काटनी होगी 18 महीने की सजा

अब वकील को 18 महीने की सजा काटनी होगी. कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस स्थान पर शिकायतकर्ता को सम्मान मिलना चाहिए था और कानून की गरिमा को बनाए रखना था, वहीं उन्हें दुर्व्यवहार, अनुचित आचरण और अपमान सहना पड़ा. वह भी एक ऐसे व्यक्ति के हाथों जिस पर अदालत की मर्यादा बनाए रखने का दायित्व था.

न्यायिक पद पर आसीन किसी महिला को यह महसूस कराया जाए कि उसका अधिकार दूसरों की शालीनता या संयम पर निर्भर है, अन्यथा न्यायिक स्वतंत्रता की बुनियाद ही हिल जाएगी. कोई भी जज चाहे पुरूष हो या महिला को भी यह महसूस नहीं कराया जाना चाहिए कि उन्हें कानून और उनके पद के प्रति सम्मान के बजाय शिष्टाचार द्वारा संरक्षित किया जा रहा है.

-भारत एक्सप्रेस 


इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital