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1868 में भारत की धरती से मिली ब्रह्मांड की वो सबसे बड़ी पहेली, जिसका राज सुलझाने में वैज्ञानिकों को लग गए पूरे 27 साल

Guntur History: 1868 में आंध्र प्रदेश के गुंटूर में लगे पूर्ण सूर्य ग्रहण ने विज्ञान की दुनिया बदल दी. फ्रांसीसी खगोलशास्त्री जूल्स जानसेन ने सूर्य के प्रकाश में एक अनजान पीली रेखा देखी, जो बाद में ‘हीलियम’ साबित हुई. ब्रह्मांड के इस रहस्यमयी तत्व की पृथ्वी पर मौजूदगी 27 साल बाद दर्ज की गई.

1868 solar eclipse India

 Guntur History: 18 अगस्त 1868 का दिन खगोल विज्ञान के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. उस दिन भारत में लगे पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान एक ऐसे तत्व का सुराग मिला, जिसे पहले कभी देखा नहीं गया था. यह ब्रह्मांड का पहला ऐसा तत्व बना, जिसे पृथ्वी पर पाए जाने से पहले अंतरिक्ष में खोजा गया था और इस ऐतिहासिक खोज का केंद्र बना भारत का गुंटूर.

भारत के गुंटूर में लगा 1868 का सूर्य ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं था, बल्कि इसने आधुनिक स्पेक्ट्रोस्कोपी और रसायन विज्ञान को हीलियम जैसा महत्वपूर्ण तत्व दिया. अंतरिक्ष में खोजे जाने के 27 साल बाद पृथ्वी पर मिला हीलियम आज विज्ञान और उद्योग का एक अनिवार्य हिस्सा है.

गुंटूर में सूर्य ग्रहण और पहली झलक (1868 solar eclipse India)

1868 के सूर्य ग्रहण को देखने के लिए दुनिया भर से वैज्ञानिक भारत पहुंचे थे. इनमें फ्रांसीसी खगोलविद पियरे जूल्स जानसेन भी शामिल थे, जिन्होंने गुंटूर में अपना स्पेक्ट्रोस्कोप सूर्य की लपटों (प्रोमिनेंस) की ओर साधा. अवलोकन के दौरान उन्हें प्रकाश के स्पेक्ट्रम में एक अनोखी और चमकीली पीली रेखा दिखाई दी. यह रेखा जानी-मानी सोडियम लाइन के पास तो थी, लेकिन उससे बिल्कुल अलग थी. जानसेन ने एक नई स्पेक्ट्रल रेखा दर्ज की, हालांकि उस समय वे यह नहीं समझ सके कि यह कौन सा तत्व है.

‘प्रोमिनेंस मेथड’ और स्पेक्ट्रोस्कोपी में क्रांति (discovery of helium in Guntur)

जानसेन केवल ग्रहण के भरोसे नहीं रहना चाहते थे. उन्होंने गुंटूर अभियान के दौरान ही एक नया तरीका विकसित किया, जिसे ‘प्रोमिनेंस मेथड’ कहा गया. उन्होंने अपने स्पेक्ट्रोस्कोप में इस तरह बदलाव किया कि किसी विशेष वेवलेंथ को अलग करके बिना सूर्य ग्रहण के भी सौर लपटों की एक-रंगी (मोनोक्रोमैटिक) छवि देखी जा सके. उनके इस सिद्धांत ने आगे चलकर स्पेक्ट्रोहेलियोस्कोप और स्पेक्ट्रोहेलियोग्राफ जैसे आधुनिक उपकरणों की नींव रखी, जिसे बाद में जॉर्ज एलेरी हेल और हेनरी डेसलैंड्रेस जैसे वैज्ञानिकों ने और बेहतर बनाया.

27 साल का रहस्य और हीलियम का नामकरण (solar prominences spectroscopy)

जानसेन द्वारा देखी गई रहस्यमयी पीली रेखा लगभग 27 वर्षों तक एक पहेली बनी रही. आखिरकार, 1895 में ब्रिटिश रसायनशास्त्री सर विलियम रामसे ने यूरेनियम अयस्क (क्लीवाइट) से इस गैस को अलग करके पृथ्वी पर इसकी मौजूदगी साबित की. चूंकि यह तत्व सबसे पहले सूर्य के प्रकाश में खोजा गया था, इसलिए ग्रीक सूर्य देवता ‘हेलियोस’ (Helios) के नाम पर इसका नाम ‘हीलियम’ रखा गया.

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-भारत एक्सप्रेस



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