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समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी से पहले प्रकट हुई थीं अलक्ष्मी, दरवाजे के बाहर दीपक रखने की पौराणिक कथा और महत्व

Diwali 2026 Alakshmi Story: कार्तिक अमावस्या पर महालक्ष्मी के स्वागत के साथ उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी के नाम से भी मुख्य द्वार के बाहर एक दीपक जलाने की परंपरा है. जानिए अलक्ष्मी के प्राकट्य, उद्दालक मुनि की कथा और घर से दरिद्रता दूर रखने के उपाय.

Diwali 2026 Alakshmi Pujan Katha Importance

Diwali 2026 Alakshmi Pujan Katha Importance

Diwali 2026 Alakshmi Story: दीपों का महापर्व दीपावली इस वर्ष 8 नवंबर (रविवार) को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा. सनातन परंपरा में यह तिथि जगतजननी महालक्ष्मी के प्राकट्य दिवस के रूप में पूजनीय है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, क्षीरसागर में हुए समुद्र मंथन के समय कार्तिक अमावस्या की गहन निशा में ही देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था. इस दिन भक्त अपने घरों को दीपमालाओं से सजाकर धन, धान्य, समृद्धि और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी का स्वागत करते हैं.

किंतु शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी के प्रकट होने से ठीक पहले उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था. अलक्ष्मी को दुर्भाग्य, अभाव और दरिद्रता की देवी माना गया है. यही कारण है कि दीपावली की रात्रि में गृहस्थजन अपने घर से दरिद्रता को दूर रखने और दुर्भाग्य के निवारण की कामना के साथ अलक्ष्मी के नाम से भी एक दीपक प्रज्वलित करते हैं.

दरवाजे के बाहर क्यों जलाया जाता है अलक्ष्मी का दीपक?

दीपावली पर जहां घर के आंगन, पूजा घर, रसोई और तिजोरी के समीप घी व तेल के दीपक देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए सजाए जाते हैं, वहीं एक विशेष दीपक घर के मुख्य द्वार (चौखट) के बाहर रखा जाता है. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस दीपक को जलाने का उद्देश्य यह होता है कि दरिद्रता और नकारात्मक ऊर्जा चौखट से ही संतुष्ट होकर लौट जाए और उसका प्रवेश घर के भीतर न हो सके. इसे चौखट के बाहर जलाकर ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि परिवार पर कभी विपन्नता, रोग और अशांति की छाया न पड़े.

पौराणिक प्रसंग: उद्दालक मुनि और अलक्ष्मी की कथा

पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब अलक्ष्मी प्रकट हुईं, तो उन्होंने आसुरी वृत्तियों का वरण किया और वे दरिद्रता की अधिष्ठात्री बनीं. इसके बाद देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्होंने जगतपालक भगवान विष्णु को अपने पति रूप में चुना. कुछ पौराणिक मान्यताओं में अलक्ष्मी को समुद्र से उत्पन्न ‘वारुणी’ (मदिरा) का रूप भी माना जाता है. कथा के अनुसार, अलक्ष्मी का विवाह महर्षि उद्दालक के साथ हुआ था. विवाह के उपरांत जब उद्दालक मुनि उन्हें लेकर अपने तपोवन और आश्रम पहुंचे, तो अलक्ष्मी ने आश्रम की पवित्र सीमा के भीतर पैर रखने से स्पष्ट इनकार कर दिया.

जब मुनि ने इसका कारण पूछा, तो अलक्ष्मी ने कहा:

“मैं उस स्थान पर कभी वास नहीं कर सकती जहां वेदों की ऋचाएं गूंजती हों, जहां स्वच्छता, यज्ञ, हवन और अतिथियों का आदर-सत्कार होता हो. मेरा निवास केवल उन घरों में होता है जहां गंदगी, आलस्य, कलह-क्लेश, अधर्म, असत्य और कलुषता का वास होता है.” अलक्ष्मी के इस कथन से स्पष्ट होता है कि जिन घरों में ब्रह्ममुहूर्त में जागरण होता है, नियमित पूजा-अर्चना और साफ-सफाई रहती है, वहां अलक्ष्मी कभी ठहर नहीं पातीं और ऐसे ही सात्विक घरों में महालक्ष्मी का स्थायी वास होता है.

जीवनशैली में उतारें दिवाली का संदेश: आलस्य और अधर्म का त्याग

दीपावली का पावन अवसर केवल बाह्य आडंबर या एक दिन की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सकारात्मक और अनुशासित जीवनशैली अपनाने का संकल्प पर्व है:

स्वच्छता और नियम: घर-आंगन को शुद्ध रखना, समय पर जागना, स्वच्छ वस्त्र धारण करना और धर्म के मार्ग पर चलना देवी लक्ष्मी की कृपा का मूल आधार है.

दोषों से दूरी: आलस्य, अधर्म, कटु वाणी, आपसी द्वेष और गंदगी सीधे तौर पर अलक्ष्मी को आकर्षित करते हैं, जिससे परिवार में आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव बढ़ता है.

अतः इस दिवाली पर जहां आप महालक्ष्मी के स्वागत में जगमगाते दीप जलाएं, वहीं चौखट के बाहर अलक्ष्मी के नाम का एक दीपक रखकर अपने जीवन से प्रमाद, दरिद्रता और नकारात्मक विचारों को सदैव के लिए विदा करने का संकल्प लें.

भारत एक्सप्रेस



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