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कब मनाई जाएगी जन्माष्टमी? इस दुर्लभ योग में बरसेगी कान्हा की विशेष कृपा, नोट कर लें पूजा का सही समय

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर इस साल दुर्लभ जयंती योग का संयोग बन रहा है. जानिए जन्माष्टमी की सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय.

Janmashtami Kab hai

जन्माष्टमी कब है?

Janmashtami Kab hai: भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाए जाने वाले कृष्ण जन्मोत्सव का इंतजार हर साल देश-दुनिया के करोड़ों भक्तों को रहता है. इस बार जन्माष्टमी की तारीख को लेकर लोगों के मन में कोई कन्फ्यूजन नहीं है, क्योंकि उदया तिथि के हिसाब से मुख्य पर्व चार सितंबर को मनाया जा रहा है. पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि की शुरुआत तीन सितंबर की देर रात 1:33 बजे से हो चुकी है और यह चार सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहेगी. देश के तमाम बड़े मंदिरों और घरों में इसी दिन कान्हा के जन्मोत्सव की धूम देखने को मिल रही है.

पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण

लड्डू गोपाल की पूजा के लिए इस बार रात 11:26 बजे से लेकर 12:11 बजे तक का सबसे उत्तम मुहूर्त रहेगा. इस तरह भक्तों को भगवान की आराधना और अभिषेक के लिए कुल 46 मिनट का बेहद खास समय मिलेगा. वहीं जो लोग इस दिन व्रत रख रहे हैं वे अगले यानी पांच सितंबर की सुबह 6:00 बजे के बाद अपना व्रत खोल सकते हैं.

इस साल क्यों खास है जन्माष्टमी?

ज्योतिषों के अनुसार इस बार की जन्माष्टमी बेहद खास है क्योंकि कई दशकों बाद यह ‘जयंती योग’ में आई है. शास्त्रों के मुताबिक जब भादो मास की कृष्ण अष्टमी के साथ रोहिणी नक्षत्र, चंद्रमा की वृष राशि और मध्यरात्रि में वृष लग्न का अद्भुत संयोग बनता है, तब जयंती योग का निर्माण होता है. इस बार यह सभी शुभ योग एक साथ मिल रहे हैं, जिससे इस दिन की गई पूजा और साधना का कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रोहिणी नक्षत्र चंद्रदेव का सबसे प्रिय नक्षत्र है. चंद्रदेव की इच्छा थी कि जब भगवान विष्णु उनके वंश में अवतार लें तो वे साक्षात उनके दर्शन कर सकें. इसी अभिलाषा को पूरा करने के लिए भगवान कृष्ण ने रात्रि बेला में अवतार लिया था. पुराणों में भी इस बात का उल्लेख है कि जब कन्हैया का जन्म हुआ था तब आकाश में चंद्रदेव प्रकट होकर उनके दर्शन पाकर धन्य हुए थे.

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पूजा के खास नियम

इस पावन अवसर पर ग्रहों की स्थिति भी बहुत ही शुभ योग बना रही है. देवगुरु बृहस्पति अपनी उच्च राशि कर्क में विराजमान हैं, जबकि ग्रहों के राजा सूर्य अपनी स्वराशि सिंह में रहकर अनुकूल फल दे रहे हैं. इसके अलावा सुख-सौंदर्य और प्रेम के कारक शुक्र अपनी तुला राशि में बैठकर इस दिन के महत्व को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं.

मध्यरात्रि में जब कान्हा का जन्म हो तो उन्हें पंचामृत से स्नान कराकर माखन-मिश्री का भोग लगाना चाहिए. शंख बजाकर उनका स्वागत करें और उनके श्रृंगार में मोरपंख, बांसुरी, वैजयंती माला और चांदी की पायल जैसी चीजें जरूर शामिल करें.

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-भारत एक्सप्रेस



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