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राजनांदगांव में शीतला अष्टमी की अनोखा परंपरा! घरों में नहीं जले चूल्हे, जानें कैसे हुई माता शीतला की पूजा?

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में शीतला अष्टमी पर श्रद्धालुओं ने परंपरा के अनुसार घरों में चूल्हा नहीं जलाया. एक दिन पहले बने बासी पकवानों का भोग लगाकर माता शीतला से आरोग्य और सुख-शांति की कामना की गई…

रिपोर्ट-नेमिष अग्रवाल


Sheetla Ashtami celebration Rajnandgaon: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में आज श्रद्धा और परंपरा का एक बेहद खूबसूरत और अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है. मौका है ‘शीतला अष्टमी’ का, जिसे स्थानीय लोग पूरी आस्था के साथ मना रहे हैं. आज शहर के अधिकांश घरों में सुबह से चूल्हा नहीं जला है. हैरान मत होइए, यह किसी हड़ताल की वजह से नहीं, बल्कि माता शीतला के प्रति अटूट विश्वास की वजह से है. मान्यता है कि इस दिन माता को केवल ‘ठंडा’ भोजन ही अर्पित किया जाता है, जिसे बोलचाल की भाषा में ‘बसौड़ा’ भी कहते हैं.

बासी पकवानों का भोग और भक्ति का माहौल

इस त्योहार की तैयारी एक दिन पहले ही शुरू हो गई थी. घरों में महिलाओं ने कल ही पूड़ी, बड़ा, गुजिया, सुहारी और दाल जैसे तरह-तरह के पकवान बनाकर रख लिए थे. आज सुबह जब सूरज की पहली किरण राजनांदगांव की धरती पर पड़ी, तभी से माता शीतला के मंदिरों में महिलाओं का तांता लगना शुरू हो गया. पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं हाथों में पूजा की थाली लिए माता के जयकारे लगाती नजर आईं. कल का बना हुआ भोजन ही आज प्रसाद के रूप में माता को चढ़ाया गया और फिर पूरे परिवार ने इसी ‘ठंडे प्रसाद’ को ग्रहण किया.

नीम की पत्तियां और ठंडे जल से ‘आरोग्य’ की कामना

शीतला अष्टमी की पूजा का विधान भी बड़ा खास है. मंदिरों में पहुंची श्रद्धालु महिलाओं ने माता शीतला की प्रतिमा को ठंडे जल और नीम की पत्तियों से स्नान कराया. नीम, जिसे आयुर्वेद में औषधि माना जाता है, उसे माता शीतला की पूजा में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता है.

मान्यता है कि माता शीतला ‘चेचक’ और ‘खसरे’ जैसे संक्रामक रोगों को दूर रखती हैं. गर्मी के मौसम की शुरुआत में होने वाली यह पूजा दरअसल स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने का एक जरिया है. महिलाओं का मानना है कि माता को ठंडा जल और नीम अर्पित करने से न केवल शरीर को शीतलता मिलती है, बल्कि परिवार के बच्चे भी बीमारियों से बचे रहते हैं.

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पीढ़ियों से चली आ रही है यह अटूट परंपरा

राजनांदगांव की एक स्थानीय महिला ने बताया, “यह परंपरा हमारे पुरखों के समय से चली आ रही है. होली के बाद पड़ने वाली इस अष्टमी का हमें बेसब्री से इंतजार रहता है. आज के दिन चूल्हा न जलाने के पीछे का तर्क भी यही है कि हम अग्नि और गर्मी से दूर रहकर शीतलता का आह्वान करते हैं. माता की कृपा से घर में सुख-शांति बनी रहती है. ”

शहर के पुराने इलाकों से लेकर नए कॉलोनियों तक, हर तरफ मंदिरों में विशेष साज-सज्जा की गई है. बच्चे भी बड़े उत्साह के साथ इस पर्व का हिस्सा बन रहे हैं. राजनांदगांव का यह उत्सव बताता है कि आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी जड़ें अपनी संस्कृति और मान्यताओं में कितनी गहराई तक जमी हुई हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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