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1975 emergency

भारत के राजनीतिक इतिहास में 1975 से 1977 के बीच लगा आपातकाल आज भी सबसे चर्चित और विवादित घटनाओं में गिना जाता है. इस दौर को लेकर कई किताबें और लेख लिखे जा चुके हैं, लेकिन इतिहासकार ज्ञान प्रकाश की किताब ‘आपातकाल आख्यान: इंदिरा गांधी और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा’ इस पूरे घटनाक्रम को देखने का एक अलग और गहरा नजरिया पेश करती है.

Emergency and Cinema: 1975 के आपातकाल के दौरान तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाने पर कन्नड़ फिल्म 'चंदा मरुता' की अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी को जेल में जानलेवा यातनाएं दी गईं. इसी दौर में इंदिरा सरकार पर तीखा व्यंग्य करने वाली फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' के प्रिंट तक जला दिए गए थे.

NCERT की नई किताब में कक्षा 9 के छात्रों के लिए 1975 की इमरजेंसी को शामिल किया गया है. ‘Understanding Society: India and Beyond-Part 1’ नाम की इस किताब में भारतीय लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों पर विशेष फोकस रखा गया है.

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक फैसले में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली चुनाव को रद्द कर दिया था. राज नारायण की याचिका पर आए इस फैसले में इंदिरा पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप सही पाया गया और उन पर 6 साल का प्रतिबंध लगा दिया गया.

Shashi Tharoor on Emergency: शशि थरूर ने आर्टिकल में आगे लिखा कि जब आपातकाल लगा तो वो उस समय देश में ही थे. लेकिन कुछ दिनों के बाद वो अमेरिका पढ़ने चले गए. वहीं से वो आपातकाल को देखा.

पीएम मोदी ने इस दौरान भारत की जनता की अदम्य शक्ति की भी सराहना की. उन्होंने कहा कि उस काले दौर में भी भारतीय जनता न झुकी, न टूटी, और न ही लोकतंत्र के साथ कोई समझौता किया.

इमरजेंसी की 50वीं बरसी पर सीएम भजनलाल शर्मा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला. कहा- 1975 में लोकतंत्र का गला घोंटा गया, एक लाख से अधिक सेनानियों को जेल में डाला गया.