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1975 का आपातकाल और बॉलीवुड: ‘किस्सा कुर्सी का’ से ‘नसबंदी’ तक, जब तानाशाही के दौर में फिल्मों पर चला था सेंसर का चाबुक

Emergency and Cinema: 1975 के आपातकाल के दौरान तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाने पर कन्नड़ फिल्म ‘चंदा मरुता’ की अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी को जेल में जानलेवा यातनाएं दी गईं. इसी दौर में इंदिरा सरकार पर तीखा व्यंग्य करने वाली फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ के प्रिंट तक जला दिए गए थे.

Emergency and Cinema

 Emergency and Cinema: साल 1975 में देश में लागू हुआ राष्ट्रीय आपातकाल (Emergency) न केवल भारतीय राजनीति बल्कि सिनेमा जगत के लिए भी एक काला अध्याय था. इस दौरान सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाली फिल्मों की आवाज को बेरहमी से दबाया गया. सेंसरशिप का आलम यह था कि जहां कुछ फिल्मों के प्रिंट जला दिए गए, वहीं एक कन्नड़ फिल्म की मुख्य अभिनेत्री को जेल की सलाखों के पीछे भयानक यातनाएं झेलनी पड़ीं.

1975 के आपातकाल के दौरान भारतीय सिनेमा पर सख्त सेंसरशिप लागू की गई थी. कन्नड़ फिल्म ‘चंदा मरुता’ की अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी को जेल में प्रताड़ित किया गया, जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई. वहीं, इंदिरा गांधी सरकार पर व्यंग्य करने वाली फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ के प्रिंट सरकार द्वारा जला दिए गए. इसके अलावा ‘आंदोलन’ और आई.एस. जौहर की ‘नसबंदी’ जैसी फिल्मों पर भी प्रतिबंध लगाया गया, जो बाद में सत्ता बदलने के बाद ही रिलीज हो सकीं.

कन्नड़ फिल्म ‘चंदा मरुता’ और स्नेहलता रेड्डी की दर्दनाक दास्तान

आपातकाल के दौर में केवल बम्बइया सिनेमा ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सिनेमा भी प्रतिरोध का मुख्य केंद्र बना था. कन्नड़ में पी. लंकेश के नाटक पर आधारित एक फिल्म बन रही थी ‘चंदा मरुता’ (जंगली हवा). इस फिल्म की खासियत यह थी कि इसके निर्माताओं ने 1975 से पहले ही देश के सामाजिक-राजनीतिक हालात को देखकर यह भांप लिया था कि देश तानाशाही और आपातकाल की तरफ बढ़ रहा है.

फिल्म की शूटिंग खत्म होते ही देश में इमरजेंसी लागू हो गई. इस फिल्म की मुख्य अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी समाजवादी विचारों वाली थीं. जॉर्ज फर्नांडीस और अन्य नेताओं से उनकी निकटता के कारण उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, जहां उन्हें गंभीर यातनाएं दी गईं. जेल से रिहा होने के कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया और वह अपनी फिल्म की रिलीज भी नहीं देख सकीं.

‘किस्सा कुर्सी का’ के प्रिंटों को सरेआम जलाया गया (The Emergency and cinema)

इमरजेंसी के विरोध की दूसरी सबसे बड़ी मिजाज वाली फिल्म थी ‘किस्सा कुर्सी का’, जिसके निर्देशक पूर्व कांग्रेस सांसद अमृत नाहटा थे. इंदिरा गांधी और संजय गांधी की नीतियों पर तीखा राजनीतिक सटायर करने वाली इस फिल्म से तत्कालीन सरकार इतनी नाराज थी कि इसके सारे प्रिंट जब्त कर जला दिए गए (Snehlata Reddy’s imprisonment).

बाद में शाह आयोग की रिपोर्ट में इसके लिए संजय गांधी और तत्कालीन सूचना मंत्री वीसी शुक्ला को दोषी पाया गया. शबाना आजमी, राज बब्बर और उत्पल दत्त जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म को आपातकाल हटने के बाद दोबारा बनाकर रिलीज किया गया, लेकिन इसे दर्शक नहीं मिले.

‘आंदोलन’ और ‘नसबंदी’ पर भी चला सेंसर का चाबुक

इसी तरह लेख टंडन की फिल्म ‘आंदोलन’ को इसलिए प्रतिबंधित किया गया क्योंकि इसमें व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह दिखाया गया था, जिससे सरकार को जनाक्रोश भड़कने का डर था. वहीं, प्रख्यात हास्य कलाकार आई. एस. जौहर ने फिल्म ‘नसबंदी’ के जरिए सरकार के जबरन नसबंदी अभियान और सरकार समर्थक बॉलीवुड सुपरस्टार्स पर तीखा तंज कसा.

इसमें अमिताभ बच्चन, मनोज कुमार और राजेश खन्ना के डमी किरदारों के जरिए कटाक्ष किया गया था. सरकार ने इस फिल्म को भी बैन कर दिया. ये सभी फिल्में आपातकाल हटने के बाद 1977 में पर्दे पर तो आईं, लेकिन व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हो सकीं.

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-भारत एक्सप्रेस 



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