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वंदे मातरम के 150 साल: यूपी विधानसभा में बोले CM योगी- कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति ने वंदे मातरम को विवाद का मुद्दा बनाया, जिन्ना ने जहर उगला

Yogi Adityanath on Vande Mataram: यूपी विधानसभा सत्र के दौरान आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कांग्रेस की तुष्टीकरण राजनीति और जिन्ना ने वंदे मातरम को विवादित बनाया, जिससे देश का बंटवारा हुआ. यह राष्ट्र की आत्मा है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर विशेष चर्चा की. उन्होंने कांग्रेस और मोहम्मद अली जिन्ना को भारत के सांस्कृतिक विभाजन और देश के बंटवारे का जिम्मेदार बताया.

सीएम योगी ने कहा कि वंदे मातरम पर किया गया समझौता कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति का पहला बड़ा प्रयोग था. इससे अलगाववाद को बढ़ावा मिला.

सीएम बोले- जब तक जिन्ना कांग्रेस में थे, तब तक वंदे मातरम पर कोई विवाद नहीं था. लेकिन कांग्रेस छोड़ने के बाद जिन्ना ने इसे मुस्लिम लीग की राजनीति का हथियार बना लिया. उन्होंने इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की. गीत वही रहा, लेकिन एजेंडा बदल गया. योगी ने यह बातें विधानसभा में कही.

1937 के घटनाक्रम पर बोले सीएम

सीएम योगी ने 1937 के घटनाक्रम का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ से जिन्ना ने वंदे मातरम के खिलाफ आवाज उठाई. उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे. इसके पांच दिन बाद 20 अक्टूबर को नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखा. इसमें कहा गया कि यह मुद्दा मुसलमानों को आशंकित कर रहा है.

सीएम योगी ने इसे कांग्रेस के तुष्टीकरण की स्पष्ट स्वीकारोक्ति बताया. कहा- 26 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस ने वंदे मातरम के कुछ हिस्सों को हटाने का फैसला लिया. इसे सद्भाव कहा गया, लेकिन योगी के मुताबिक यह राष्ट्र चेतना की बलि थी. देशभक्तों ने इसका विरोध किया. प्रभात फेरियां निकाली गईं. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व वोट बैंक के साथ खड़ा हो गया, राष्ट्र के साथ नहीं.

जिन्ना की मांग, कांग्रेस की चुप्पी

सीएम योगी ने आगे कहा कि 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने मांग की कि वंदे मातरम को पूरी तरह बदल दिया जाए. लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध नहीं किया. इससे मुस्लिम लीग का हौसला बढ़ा. अलगाववाद की धार तेज हुई. सांस्कृतिक प्रतीकों पर पहला समझौता हुआ. इससे भारत के बंटवारे की नींव पड़ी.

सीएम योगी ने जोर दिया कि वंदे मातरम का विरोध धार्मिक नहीं था. यह पूरी तरह राजनीतिक था. 1896 से 1922 तक कांग्रेस के हर अधिवेशन में यह गीत गाया जाता था. न कोई फतवा था, न धार्मिक विवाद. खिलाफत आंदोलन तक यह हर मंच पर गूंजता था. मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता इसके समर्थक थे. समस्या मजहब से नहीं, कुछ लोगों की राजनीति से थी.

1923 का कांग्रेस अधिवेशन

सीएम योगी ने 1923 के कांग्रेस अधिवेशन का उल्लेख किया. उसमें मोहम्मद अली जौहर ने पहली बार वंदे मातरम का विरोध किया. यह विरोध धार्मिक नहीं था. यह खिलाफत की राजनीति से प्रेरित था. जब विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने पूरा गीत गाया, तो जौहर मंच छोड़कर चले गए. मंच छोड़ना उनका व्यक्तिगत फैसला था. लेकिन कांग्रेस का झुकना उसकी नीति बन गई.

इसके बाद कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के पक्ष में मजबूती से खड़े होने की बजाय समितियां बनाईं. अंत में 1937 में फैसला हुआ कि केवल दो छंद गाए जाएंगे. और वह भी अनिवार्य नहीं होंगे. योगी ने इसे राष्ट्रीय आत्मसमर्पण बताया.

1950 का संविधान सभा फैसला

सीएम योगी ने कहा कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने खंडित वंदे मातरम को मान्यता दी. यह भी कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति का नतीजा था. राष्ट्र ने गीत को अपनाया, लेकिन कांग्रेस ने पहले ही उसे काट दिया था. वंदे मातरम केवल गीत नहीं है. यह भारत की आत्मा है.
1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक यह प्रभात फेरियों, सत्याग्रहों और क्रांतिकारियों की अंतिम सांस तक का मंत्र रहा. रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे भारत की आत्मा कहा. अरविंद घोष ने इसे मंत्र बताया. मैडम भीकाजी कामा द्वारा फहराए गए पहले विदेशी तिरंगे पर वंदे मातरम लिखा था. मदनलाल ढींगरा के अंतिम शब्द भी वंदे मातरम थे.

समझौते का अपमान और चेतावनी

सीएम योगी ने कहा कि वंदे मातरम के साथ किया गया समझौता केवल गीत का अपमान नहीं था. यह भारत की राष्ट्रीय दिशा पर क्रूर प्रहार था. आज भी कुछ राजनीतिक शक्तियां उसी विभाजनकारी सोच को जीवित करने की कोशिश कर रही हैं. तब राष्ट्रगीत को निशाना बनाया गया. आज राष्ट्रभाव को कमजोर करने की कोशिश हो रही है.

सीएम योगी ने कहा कि वंदे मातरम का अर्थ केवल मातृभूमि को प्रणाम करना नहीं है. यह उसकी रक्षा, समृद्धि और गौरव का संकल्प है. तुष्टीकरण की ऐतिहासिक भूलों से सीख लेकर ही श्रेष्ठ, आत्मनिर्भर और विकसित भारत बन सकता है. उन्होंने सदन से अपील की कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘आनंद मठ’ का अध्ययन करें. राष्ट्र चेतना को समझें. वंदे मातरम के 150 वर्ष को भविष्य के संकल्प के रूप में अपनाएं.

वंदे मातरम: राष्ट्र की चेतना का मंत्र

एक अन्य चर्चा में योगी ने कहा कि वंदे मातरम केवल गीत नहीं है. यह स्वतंत्रता संग्राम की चेतना, क्रांतिकारियों के साहस और राष्ट्र के आत्मसम्मान का मंत्र है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश पहली विधानसभा है, जहां इस विषय पर विस्तार से चर्चा हो रही है.

यह चर्चा किसी गीत की वर्षगांठ नहीं है. यह भारत माता के प्रति राष्ट्रीय कर्तव्यों की पुनर्स्थापना का अवसर है. वंदे मातरम का सम्मान हमारे संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय दायित्वों का बोध कराता है. यह राष्ट्र की आत्मा, संघर्ष और संकल्प का प्रतीक है. यह काव्य नहीं है. यह मातृभूमि की आराधना, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति है.

इतिहास के संदर्भ में वंदे मातरम

योगी ने कहा कि जब वंदे मातरम अपनी रजत जयंती मना रहा था, तब देश ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था. 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर की विफलता के बाद अंग्रेज दमन कर रहे थे. काले कानूनों से जनता की आवाज दबाई जा रही थी. लेकिन वंदे मातरम ने सुप्त चेतना को जीवित रखा. जब रजत और स्वर्ण जयंती मनाई गई, तब भी ब्रिटिश शासन था. उस समय कांग्रेस के अधिवेशन स्वतंत्रता की चेतना बढ़ाने के मंच थे. 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे स्वर दिया. यह पूरे देश का मंत्र बन गया.

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आपातकाल और शताब्दी

सीएम योगी ने कहा कि जब वंदे मातरम की शताब्दी आई, तब कांग्रेस सत्ता में थी. उसने कभी इस गीत को मंच दिया था. लेकिन उसने आपातकाल थोपकर संविधान का गला घोंटा. यह इतिहास का काला कालखंड है.

आज 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं. भारत मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत की ओर बढ़ रहा है. बंकिमचंद्र का सपना नया भारत साकार कर रहा है. इसलिए यह चर्चा सामयिक है.

1857 का स्वातंत्र्य समर

सीएम योगी ने 1857 के समर का उल्लेख किया. बैरकपुर में मंगल पांडेय, गोरखपुर में बंधु सिंह, मेरठ में धन सिंह कोतवाल और झांसी में रानी लक्ष्मीबाई ने संघर्ष किया. विफलता के बाद हताशा आई. लेकिन वंदे मातरम ने आत्मा जगाई.

  • बंकिमचंद्र ब्रिटिश शासन में डिप्टी कलेक्टर थे. उन्होंने जनमानस की भावनाओं को स्वर दिया. वंदे मातरम औपनिवेशिक मानसिकता के प्रतिकार का प्रतीक बना. भारत माता भूभाग नहीं, हर भारतीय की भावना है. स्वाधीनता राजनीति नहीं, साधना है.
  • ‘सुजलाम, सुफलाम् मलयज-शीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम्’ की पंक्तियों ने चेतना का संचार किया. भारत की प्रकृति, समृद्धि, सौंदर्य और शक्ति को मूर्त रूप दिया.


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