13 अप्रैल 2026 को नोएडा में हुए मजदूरों के हिंसक प्रदर्शन का मामला अब सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, पुलिस की कार्रवाई और उसके दावों पर भी सवाल उठने लगे हैं. इस पूरे केस में लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और नोएडा की एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर NSA लगाया गया है.
पुलिस का आरोप है कि दोनों ने सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों से मजदूरों को भड़काने का काम किया. साथ ही विदेशी फंडिंग मिलने की बात भी कही गई है. लेकिन अब इसी कहानी में कई ऐसे छेद दिखाई दे रहे हैं, जिन पर वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं.
अब सवाल आकृति चौधरी को लेकर है. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, आकृति को 11 अप्रैल को ही मेट्रो स्टेशन से हिरासत में ले लिया गया था. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब वह दो दिन पहले ही पुलिस की पकड़ में थीं, तो 13 अप्रैल को हुई हिंसा को भड़काने में उनकी भूमिका कैसे हो सकती है? इस विरोधाभास ने पुलिस की थ्योरी को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
दूसरी तरफ पत्रकार सत्यम वर्मा की गिरफ्तारी को लेकर भी विवाद गहराता जा रहा है. जानकारी के अनुसार, 65 वर्षीय सत्यम वर्मा मजदूर अधिकारों पर लंबे समय से लिखते और काम करते रहे हैं. 9 अप्रैल से नोएडा में मजदूरों का प्रदर्शन शुरू हुआ था. इसी दौरान उनके एक लेख को लेकर पुलिस सतर्क हो गई. हसनगंज पुलिस उनके दफ्तर पहुंची और उनसे लेख हटाने को कहा. सत्यम ने बिना किसी विरोध के लेख डिलीट भी कर दिया.
पुलिस संपर्क में रहने के बावजूद गिरफ्तारी पर सवाल
करीब एक हफ्ते बाद पुलिस फिर दफ्तर पहुंची और सत्यम वर्मा के साथ उनकी सहयोगी कात्यायनी सिन्हा को पूछताछ के लिए अपने साथ ले गई. परिवार और वकीलों का आरोप है कि सत्यम को 17 अप्रैल को ही लखनऊ से उठा लिया गया था, लेकिन आधिकारिक गिरफ्तारी 19 अप्रैल को दिखाई गई. इस दौरान वह लगातार पुलिस के संपर्क में थे और नोएडा में मौजूद भी नहीं थे.
पुलिस ने प्रेस नोट जारी कर दावा किया कि सत्यम वर्मा को विदेशों से करीब 1 करोड़ रुपए की फंडिंग मिली थी. हालांकि अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर इतने बड़े आर्थिक लेनदेन के सबूत मौजूद थे, तो उन्हें अदालत में पेश क्यों नहीं किया गया? बचाव पक्ष का कहना है कि पुलिस के पास अभी तक इस दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेज नहीं हैं.
कानूनी जानकारों की राय में पारदर्शिता जरूरी
इसके अलावा एफआईआर दर्ज करने में देरी और एक ही मामले में कई एफआईआर दर्ज होने को लेकर भी बहस छिड़ गई है. कानूनी जानकारों का कहना है कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता बेहद जरूरी होती है, क्योंकि NSA जैसे सख्त कानून का इस्तेमाल किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर असर डालता है.
अब यह मामला सिर्फ हिंसा की जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और सबूतों की विश्वसनीयता पर भी बड़ा सवाल बन चुका है. आने वाले दिनों में अदालत में होने वाली सुनवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकती है.
-भारत एक्सप्रेस
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