Bharat Express DD Free Dish

‘IAS का अनुभव + राजा भैया की जमीनी पकड़’ क्या दिव्या मित्तल को मिलेगा जनसत्ता दल का साथ? कितना पड़ेगा असर, पढ़िये-EXPLAINER

Divya Mittal With Raja Bhaiya: एक वायरल पोस्ट में IAS दिव्या मित्तल प्रतापगढ़ के बाहुबली विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के साथ नजर आती हैं. यह पोस्ट जनसत्ता दल लोकतांत्रिक पार्टी के प्रदेश प्रधान डॉ. बृजेश सिंह रजावत ने की. राजा भैया की पकड़ मुख्यतः क्षत्रिय समाज और स्थानीय समर्थकों में मानी जाती है. जबकि दिव्या मित्तल की पहचान शहरी, पढ़े-लिखे और सुशासन चाहने वाले मतदाताओं में हो सकती है.

up-election-2027-divya-mittal-raja-bhaiya-new-political-equation

क्या राजा भैया के साथ जाएंगी पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल? (AI Generated)

Divya Mittal With Raja Bhaiya: साल 2026, 29 सितंबर की तारीख और दिन मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (X) पर एक वीडियो डाला जाता है. इस वीडियो में एक महिला मैरून (Maroon) रंग की साड़ी पहनकर सामने आती है और जो बात कहती है वो यूपी की राजनीति में बड़ा बवंडर खड़ा कर देता है. यह महिला कोई और नहीं, हाल ही में IAS के पद से त्यागपत्र देकर चर्चा में आईं पूर्व IAS दिव्या मित्तल हैं. वो वीडियो में कहती हैं कि मेरा अगला कदम राजनीति है. दिव्या मित्तल के सिर्फ इस एक ऐलान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया. कई बड़े राजनीतिक दलों के नेताओं और मंत्रियों ने जहां उन्हें काबिल आईएएस करार दिया. तो कईयों ने उनके इस कदम को मजाक बताया.

इन्हीं राजनीतिक बयानबाजी के बीच एक पोस्ट वायरल होता है, जिसमें IAS दिव्या मित्तल प्रतापगढ़ के बाहुबली विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के साथ नजर आती हैं. यह पोस्ट जनसत्ता दल लोकतांत्रिक पार्टी के प्रदेश प्रधान डॉ. बृजेश सिंह रजावत ने की. इस पोस्ट में उन्होंने लिखा है,”IAS का अनुभव+राजा भैया की जमीनी पकड़=क्या UP में नई दिशा की शुरुआत?”.

पोस्ट सामने आते ही उत्तर प्रदेश का राजनीतिक माहौल पूरी तरह गर्मा गया. लोगों के बीच चर्चा तेज हो गई कि क्या राजनीति में आने का ऐलान कर चुकीं दिव्या मित्तल को ‘राजा भैया’ का साथ मिल गया है. और अगर ऐसा होता है तो उत्तर प्रदेश की राजनीति किस करवट बैठेगी. साथ ही एक सवाल ये भी खड़ा होता है कि ‘दिव्या मित्तल और राजा भैया’ की जोड़ी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर कितना प्रभाव डाल सकेगी. आइये एक-एक कर इन सभी पहलुओं को डिकोड करते हैं.

कैसे शुरू हुआ विवाद?

राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं के अनुसार केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल के बीच विवाद गहराने के चलते दिव्या मित्तल ने इस्तीफा दिया है. इस विवाद की वजह बनी मिर्जापुर के लहुरियादह पानी विवाद. दरअसल लहुरियादह गांव में 75 सालों के बाद पहली बार पाइपलाइन से पानी पहुंचाया गया. जिसका श्रेय तत्कालीन डीएम दिव्या मित्तल को दिया गया. इलाके के लोग आज भी दिव्या मित्तल के लिए भावुक नजर आते हैं. इस परियोजना के उद्घाटन कार्यक्रम में स्थानीय सांसद अनुप्रिया पटेल को आमंत्रित नहीं किया गया था. जिसके बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ गया. इस विवाद के बाद अचानक से दिव्या मित्तल का मिर्जापुर से ट्रांसफर कर दिया जाता है. उन्हें बिना पोस्टिंग के कई महीनों तक वेटिंग लिस्ट में रख दिया जाता है. लोगों का कहना है कि अनुप्रिया पटेल के रसूख को देखते हुए दिव्या मित्तल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और खुद राजनीति में आने का ऐलान कर दिया.

यहीं से इस कहानी का राजनीतिक पहलू शुरू होता है. दिव्या मित्तल की पहचान ‘सिस्टम से टकराने वाली डीएम’ के रूप में होती है. यहीं उनके लिये सबसे बड़ी पूंजी है. तबादला, वेटिंग लिस्ट और फिर इस्तीफे ने इस कहानी को और नाटकीय बना दिया. अगर पूर्व IAS उत्तर प्रदेश के बाहुबली राजा भैया के साथ आती हैं तो यह विरोधियों के लिये बड़ा सेटबैक जैसा होगा. इसका असर सिर्फ एक सीट पर नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल पर दिखाई दे सकता है.

राजा भैया की सियासी ताकत

रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया प्रतापगढ़ की कुंडा सीट से 1993 से लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं. तीन दशक से ज्यादा समय तक एक ही सीट पर अजेय रहना अपने आप में उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़ का सबूत है. उन्होंने 2018 में जनसत्ता दल लोकतांत्रिक नाम से अपनी पार्टी बनाई, जिसके 2022 के विधानसभा चुनाव में दो विधायक जीते, कुंडा से खुद राजा भैया और बाबागंज से उनके साथी विनोद सरोज. पार्टी बड़ी नहीं है, लेकिन प्रतापगढ़, कौशांबी और आसपास के अवध-पूर्वांचल के इलाकों में उसका असर माना जाता है. राजा भैया की राजनीति पार्टी संगठन से ज़्यादा उनके निजी नेटवर्क, क्षत्रिय समाज में पैठ और स्थानीय दबदबे पर टिकी रही है. यही वजह है कि उनकी पार्टी भले छोटी हो, चुनावी गणित में उसकी पूछ बड़े दल भी करते रहे हैं.

अगर दिव्या मित्तल जनसत्ता दल में आईं तो क्या बदलेगा?

इसका पहला असर पार्टी की छवि पर पड़ेगा. राजा भैया की पहचान लंबे समय से बाहुबली नेता की रही है. मुलायम सिंह यादव के शासन में तो राजा भैया को उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह से भी बड़ा ठाकुरों का नेता माना जाता था. पूर्वांचल में ठाकुरों की आबादी करीब 10 प्रतिशत है. ऐसे में एक पढ़ी-लिखी, काम करने वाली और ईमानदार मानी जाने वाली पूर्व IAS का जुड़ना जनसत्ता दल को एक नई पहचान दे सकता है.

दिव्या मित्तल अगर राजा भैया के साथ आती हैं तो इसका असर संगठन पर भी पड़ेगा. एक ऐसा चेहरा जिसकी लोकप्रियता आम लोगों में ज्यादा हो. लोग उन्हें एक बेहतरीन प्रशासक मानते हैं. ऐसे में उनका जनसत्ता दल से जुड़ना आम लोगों को भी भरोसा देगा. राजा भैया की बाहुबली की छवि से कई पढ़े-लिखे लोग पार्टी से जुड़ने से बचते हैं. ऐसे में दिव्या मित्तल की छवि और जनसत्ता दल का स्थानीय नेटवर्क उनको राजनीति में नई पहचान दे सकता है. दिव्या मित्तल पार्टी को वह भरोसेमंद चेहरा दे सकती हैं, जिसकी उसे तलाश है. यानी दोनों एक-दूसरे की कमी की भरपाई कर सकते हैं.

विंध्य क्षेत्र की राजनीति पर पड़ सकता है असर

अनुप्रिया पटेल की ताकत विंध्य क्षेत्र में पड़ने वाला उनका पटेल (कुर्मी) वोट बैंक है. मिर्जापुर से लेकर चित्रकूट और प्रयागराज के आसपास के इलाकों में कुर्मी वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है. मिर्जापुर अनुप्रिया पटेल का गढ़ माना जाता है और उनकी पार्टी अपना दल (एस) का इलाके में अच्छा प्रभाव है. दिव्या मित्तल की लोकप्रियता खासकर लहुरियादह जैसे कई गांवों में अनुप्रिया पटेल के लिए सीधी चुनौती बन सकती है. अगर दिव्या मित्तल राजा भैया के साथ चुनावी चक्रव्यूह में उतरती हैं तो यह मुकाबला सिर्फ दो नेताओं का नहीं बल्कि प्रशासनिक साख बनाम राजनीतिक रसूख का होगा. हालांकि इलाके का जातीय समीकरण और अपना दल (एस) का कोर वोट बैंक उनके लिए बड़ा रोड़ा साबित हो सकता है.

राजा भैया का पूर्वांचल में दबदबा किसी से छिपा नहीं है. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में अनुप्रिया पटेल ने राजा भैया के गढ़ में आकर उन्हें चुनौती दी थी और कहा था, ‘अब राजा, रानी के कोख से पैदा नहीं होता. भारत में अब लोकतंत्र है. जनता ही आज यह तय करती है कि कौन राजा बनेगा और कौन नहीं’. जिसका जवाब देते हुए राजा भैया ने कहा था, ‘लोकतंत्र में जनसेवक पैदा होता है, राजा नहीं. जनसेवक का कार्यकाल 5 सालों का होता है. इसके बाद फिर जनता चुनाव करती है कि कौन उनकी सेवा करेगा.’ इस बयानबाजी के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में अनुप्रिया पटेल बनाम राजा भैया की चर्चा तेज हो गई. अगर दिव्या मित्तल अनुप्रिया पटेल के गढ़ में उन्हें चुनौती देती हैं तो यह राजा भैया के राजनीतिक बदले के तौर पर माना जा सकता है.

एनडीए और विपक्ष की टेंशन बढ़ेगी

दिव्या मित्तल अगर जनसत्ता दल से जुड़ती हैं तो इसका असर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पर होगा. अनुप्रिया पटेल का अपना दल पार्टी इस समय एनडीए का हिस्सा है और वो इसी कोटे के तहत केंद्रीय मंत्री बनी हैं. राजा भैया का रुख चुनावों में अक्सर चर्चा का विषय रहा है. हर बड़े दल उन्हें साधने की कोशिश करते रहे हैं. अगर दिव्या मित्तल के साथ उनका गठजोड़ बनता है, तो जनसत्ता दल की सौदेबाजी की ताकत बढ़ सकती है. गठबंधन की सूरत में भाजपा, सपा या कोई और दल, सभी को इस नई जोड़ी को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनानी पड़ सकती है. खासकर अवध और पूर्वांचल की उन सीटों पर, जहां जीत-हार का अंतर कम रहता है, यह जोड़ी वोट काटकर या जोड़कर नतीजे बदलने की हैसियत रख सकती है.

ठाकुर वोटबैंक का मिलेगा साथ

राजा भैया की पकड़ मुख्यतः क्षत्रिय समाज और स्थानीय समर्थकों में मानी जाती है. जबकि दिव्या मित्तल की पहचान शहरी, पढ़े-लिखे और सुशासन चाहने वाले मतदाताओं में हो सकती है. अगर यह मेल बैठ गया, तो जनसत्ता दल अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकल कर पूरे पूर्वांचल पर प्रभाव डाल सकता है.

चुनौतियां भी कम नहीं

दिव्या मित्तल की पहचान ईमानदार अफसर की रही है, जबकि राजा भैया का नाम विवादों से जुड़ता रहा है. विपक्षी दल इसी को मुद्दा बनाकर हमला बोल सकते हैं और पूछ सकते हैं कि सुशासन की बात करने वाली अफसर बाहुबली राजनीति के साथ क्यों खड़ी है. दूसरी चुनौती जनसत्ता दल का सीमित दायरा है. यूपी जैसे बड़े राज्य में जहां मुकाबला भाजपा, सपा और बसपा जैसे बड़े दलों के बीच होता है, दो-चार सीटों वाली पार्टी के लिए पूरे प्रदेश पर असर छोड़ना आसान नहीं है.

ये भी पढ़ें- बाउंड्री पर बैठे थे, अचानक दौड़े और लगा दी छलांग; प्रेमानंद महाराज के शिष्य की मौत का CCTV आया सामने

हालांकि अभी किसी भी पक्ष ने गठजोड़ की घोषणा नहीं की है. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं. ऐसे में हर नया राजनीतिक समीकरण मायने रखता है. दिव्या मित्तल का अगला कदम क्या होगा, वो किसी मौजूदा पार्टी में जाएंगी, जनसत्ता दल के साथ आएंगी या अपनी अलग राह चुनेंगी, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा. अगर वो राजा भैया की पार्टी में जाती हैं तो उनका प्रशासनिक अनुभव और जमीनी पकड़ का यह मेल यूपी की राजनीति में एक दिलचस्प प्रयोग साबित हो सकता है. लेकिन इसकी असली परीक्षा तब होगी, जब जनता इसे वोट की कसौटी पर परखेगी. फिलहाल इतना तय है कि दिव्या मित्तल ने यूपी की सियासत को नई हवा दे दी है.

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read