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UP Police: 15 साल बाद मिला इंसाफ, दारोगा राजवीर सिंह की हत्या और लूट के मामले में 3 दोषियों को उम्रकैद

साल 2010 में फिरोजाबाद के रसूलपुर थाने में तैनात दारोगा राजवीर सिंह की बदमाशों ने लूट के दौरान हत्या कर दी थी. 15 साल चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने 3 दोषियों को आजीवन कारावास और 2 साथियों को 7-7 साल की सजा सुनाई है.

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Firozabad Court Verdict: करीब 15 साल पहले उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे को दहला देने वाले दारोगा राजवीर सिंह हत्याकांड में आखिरकार इंसाफ हो गया है. फिरोजाबाद की एक अदालत ने इस सनसनीखेज मामले में कड़ा फैसला सुनाते हुए तीन मुख्य आरोपियों को ताउम्र जेल की सजा सुनाई है, वहीं उनके दो अन्य साथियों को भी सात-सात साल की जेल हुई है.

क्या था पूरा मामला?

तारीख थी 2 अगस्त 2010. इटावा के यादव नगर के रहने वाले 48 वर्षीय राजवीर सिंह, जो फिरोजाबाद के रसूलपुर थाने में दारोगा के पद पर तैनात थे, अपनी ड्यूटी खत्म कर बाइक से घर लौट रहे थे. रात के करीब साढ़े आठ बज रहे थे, जब वह नगला खंगर इलाके में कोटरी की ठार के पास एक बंबे की पटरी से गुजर रहे थे. अंधेरे का फायदा उठाकर घात लगाए बैठे बदमाशों ने उन्हें घेर लिया.

बदमाशों ने लूटपाट की कोशिश की, लेकिन जांबाज दारोगा ने हार नहीं मानी और डटकर मुकाबला किया. इसी छीनाझपटी के दौरान बदमाशों ने राजवीर सिंह को गोली मार दी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई. बेखौफ लुटेरे न केवल एक पुलिस अफसर की जान ले गए, बल्कि उनकी बाइक और सरकारी रिवाल्वर भी लूटकर फरार हो गए. इस घटना ने उस वक्त पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा दिया था.

लंबी कानूनी लड़ाई और फैसला

पुलिस ने कड़ी मशक्कत के बाद जांच शुरू की और मुठभेड़ के दौरान रामनरेश, सत्यपाल, शिवरतन और बंगाली को दबोचा, जबकि एक अन्य आरोपी पंकज ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया था. सालों तक चली गवाहियों और दलीलों के बाद अब विशेष न्यायाधीश सर्वेश कुमार पांडेय की अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित किया.

न्यायालय ने रामनरेश, सत्यपाल और पंकज को हत्या और लूट का मुख्य दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई. साथ ही, इन तीनों पर दो-दो लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया गया है. वहीं, पुलिस टीम पर हमला करने वाले इनके दो साथियों, शिवरतन और बंगाली को 7-7 साल की कैद सुनाई गई है.

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इंसाफ की जीत

राजवीर सिंह के बेटे आशीष ने इस लंबी लड़ाई की शुरुआत अज्ञात बदमाशों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराके की थी. अभियोजन की ओर से एडीजीसी नरेंद्र राठौर ने मजबूती से पक्ष रखा, जिसके बाद अदालत ने माना कि वर्दीधारी पर हमला और उनकी हत्या एक जघन्य अपराध है. 15 साल का वक्त लंबा जरूर है, लेकिन इस फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं और देर से ही सही, अपराधियों को उनके किए की सजा भुगतनी ही पड़ती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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