Bharat Express DD Free Dish
Pension Mission Shakti Digital
Pension Mission Shakti Digital

हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम के 170 साल, जानिए कैसे ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने दिलाई महिलाओं को नई जिंदगी

16 जुलाई 1856 भारतीय सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन है, जब हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम को मंजूरी मिली. इस कानून ने विधवा महिलाओं को दोबारा विवाह करने का कानूनी अधिकार दिया और समाज में लंबे समय से चली आ रही रूढ़ियों को चुनौती दी.

भारतीय सामाजिक इतिहास में 16 जुलाई का दिन एक बड़े बदलाव की शुरुआत के रूप में याद किया जाता है. साल 1856 में इसी दिन हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम को मंजूरी मिली थी. यह कानून उस दौर के समाज में एक बहुत बड़ा कदम था, क्योंकि इसने हिंदू विधवा महिलाओं को दोबारा विवाह करने का कानूनी अधिकार दिया. सदियों पुरानी रूढ़ियों और कठोर सामाजिक नियमों के बीच यह फैसला महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की दिशा में एक नई उम्मीद लेकर आया.

19वीं सदी के भारत में खासतौर पर उच्च जाति और रूढ़िवादी समाजों में विधवा महिलाओं का जीवन बहुत मुश्किल माना जाता था. बाल विवाह की परंपरा के कारण कई लड़कियां कम उम्र में ही पति को खो देती थीं और उन्हें पूरी जिंदगी अकेलेपन और सामाजिक पाबंदियों के साथ गुजारनी पड़ती थी.

विधवाओं से कई तरह की कठोर अपेक्षाएं की जाती थीं. उन्हें रंगीन कपड़े पहनने, गहने पहनने और सामान्य सामाजिक जीवन जीने तक से रोका जाता था. कई जगहों पर उन्हें परिवार और समाज में बोझ की तरह देखा जाता था. उनके लिए दोबारा विवाह की कल्पना भी स्वीकार नहीं की जाती थी. ऐसे माहौल में विधवा पुनर्विवाह का अधिकार दिलाना आसान काम नहीं था.

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने छेड़ी बदलाव की मुहिम

इस सामाजिक बदलाव के पीछे महान समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की सबसे बड़ी भूमिका रही. उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में ना सिर्फ आवाज उठाई, बल्कि धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर यह साबित करने का प्रयास किया कि हिंदू परंपराओं में विधवा विवाह के लिए जगह मौजूद है.

विद्यासागर ने इस मुद्दे को लेकर लोगों को जागरूक किया, सरकार के सामने तर्क रखे और समाज में फैली गलत धारणाओं को चुनौती दी. उन्होंने कई याचिकाएं तैयार कीं और लगातार प्रयास किया कि विधवा महिलाओं को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार मिले.

उनके विचार सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं थे. उन्होंने अपने बेटे का विवाह एक विधवा महिला से कराकर समाज के सामने एक मिसाल पेश की. इस कदम से उन्होंने दिखाया कि सामाजिक सुधार की शुरुआत अपने जीवन से भी की जा सकती है.

विद्यासागर के प्रयासों और सुधारवादी सोच के चलते ब्रिटिश सरकार ने 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया. इसकी घोषणा 16 जुलाई को हुई और बाद में 25 जुलाई 1856 से यह कानून प्रभावी हुआ. इस अधिनियम ने विधवाओं को कानूनी रूप से दोबारा विवाह करने का अधिकार दिया.

हालांकि कानून बनने के बाद भी समाज की सोच तुरंत नहीं बदली. कई लोगों ने इसका विरोध किया और इसे स्वीकार करने में समय लगा. लेकिन इस कानून ने एक ऐसी शुरुआत कर दी, जिसने आगे चलकर महिलाओं की शिक्षा, बाल विवाह के खिलाफ आंदोलनों और अन्य सामाजिक सुधारों को मजबूती दी.

आज भी याद किया जाता है यह ऐतिहासिक दिन

आज जब देश में महिला अधिकारों और समानता की बात होती है, तो 16 जुलाई का महत्व और बढ़ जाता है. यह दिन याद दिलाता है कि समाज में बदलाव लाने के लिए साहस, सोच और लगातार प्रयास की जरूरत होती है. ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे सुधारकों ने केवल एक कानून बनवाने में मदद नहीं की, बल्कि समाज की सोच को बदलने की कोशिश की. उनकी कोशिशों ने हजारों-लाखों महिलाओं के लिए सम्मानजनक जीवन की राह खोली है.

ये भी पढ़ें- ममता बनर्जी को बड़ा झटका! TMC सांसद और एक्ट्रेस कोयल मल्लिक का राज्यसभा से इस्तीफा, क्या थामेंगी बीजेपी का दामन?

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Pension Mission Shakti Digital