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1991 के उस ‘साइलेंट सेवियर’ की कहानी, जिसने पर्दे के पीछे रहकर देश की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाया

साल 1991 का आर्थिक संकट भारत के इतिहास का वह मोड़ था, जब देश का विदेशी मुद्रा भंडार मात्र दो हफ्ते के आयात जितना बचा था. दिवालिया होने से बचने के लिए भारत को बैंक ऑफ इंग्लैंड और स्विस बैंक में 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था.

1991 Economic Crisis When India Mortgaged 67 Tonne Gold To Avoid Default
Edited by Vaibhav Gupta

1991 Economic Crisis: 1991 का आर्थिक संकट भारत के आधुनिक इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था. इस संकट ने देश को दिवालियेपन (sovereign default) के बेहद करीब ला खड़ा किया था, लेकिन इसी संकट ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG Reforms) की नींव रखी, जिसने आज के आधुनिक भारत की आर्थिक यात्रा शुरू की. फिल्म गवर्नर इसी संकट की पृष्ठभूमि पर बनी है, जिसमें आरबीआई गवर्नर की भूमिका (प्रेरणा: एस. वेंकिटरामनन) को दिखाया गया है.

संकट की पृष्ठभूमि और कारण

1980 के दशक में भारत की अर्थव्यवस्था कुछ हद तक बढ़ रही थी, लेकिन यह वृद्धि अस्थिर और ऋण-आधारित थी. मुख्य कारण निम्नलिखित है:

  • उच्च राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) : सरकार का खर्च आय से कहीं अधिक था. 1990-91 में यह जीडीपी का लगभग 8-9% या इससे अधिक पहुंच गया था. भारी सब्सिडी, ऋण और सरकारी खर्च ने स्थिति बिगाड़ी.
  • चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) : आयात निर्यात से बहुत अधिक थे. तेल आयात पर निर्भरता भारी पड़ी.
  • खाड़ी युद्ध (Gulf War, 1990-91) : इराक-कुवैत संकट से तेल की कीमतें आसमान छू गईं. भारत का तेल आयात बिल बढ़ा. साथ ही, खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय मजदूरों के रेमिटेंस (धन भेजना) घट गए.
  • सोवियत संघ का विघटन : भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार टूट गया, निर्यात प्रभावित हुए.
  • राजनीतिक अस्थिरता : 1989-91 के दौरान सरकारें अस्थिर रहीं. वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर और फिर पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार. राजीव गांधी की हत्या ने अनिश्चितता बढ़ाई.
  • विदेशी मुद्रा भंडार का क्षरण : जनवरी 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार घटकर मात्र 1.2 बिलियन डॉलर रह गया, जो मुश्किल से 2-3 सप्ताह के आयात के लिए पर्याप्त था. निवेशकों का विश्वास टूटा, क्रेडिट रेटिंग गिर गई, और पूंजी बहिर्वाह (capital outflow) शुरू हो गया.

नतीजा

भारत भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis) का शिकार हो गया. देश कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट करने की स्थिति में पहुंच गया था.

  • संकट की चरम स्थिति: सोने की गिरवी
  • संकट के चरम पर भारत सरकार को कठोर कदम उठाने पड़े.
  • मई-जुलाई 1991 में आरबीआ ने कुल 67 टन सोना गिरवी रखा.
  • 20 टन यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड (UBS) को.
  • 47 टन बैंक ऑफ इंग्लैंड को.

इससे लगभग 600 मिलियन डॉलर जुटाए गए, जो आपातकालीन ऋण के लिए समय खरीदने में मददगार साबित हुए. सोने को विमान से विदेश भेजा गया- यह खबर सार्वजनिक होने पर देश में काफी आक्रोश फैला. लोग इसे राष्ट्रीय सम्मान पर आघात मानते थे. यह कदम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक से ऋण लेने के लिए जरूरी था. IMF ने शर्त रखी- आर्थिक सुधार.

सुधार

LPG की शुरुआत

जून 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री. उन्होंने संकट को अवसर में बदला:

  • रुपये का अवमूल्यन (Devaluation) : निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए.
  • लाइसेंस राज का अंत : औद्योगिक लाइसेंसिंग खत्म की गई, कई क्षेत्र निजी और विदेशी निवेश के लिए खोल दिए गए.
  • व्यापार उदारीकरण : आयात शुल्क कम किए गए.
  • वित्तीय क्षेत्र सुधार : बैंकिंग और पूंजी बाजार में बदलाव.

विदेशी निवेश प्रोत्साहन (FDI)

ये 1991 के आर्थिक सुधार कहलाए, जिन्होंने भारत को समाजवादी अर्थव्यवस्था से बाजार-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर ले जाया.

प्रभाव

  • तत्काल : संकट टला, विदेशी मुद्रा भंडार वापस बनने लगे.
  • दीर्घकालिक : 1990 के दशक के मध्य से विकास दर बढ़ी (6%+), विदेशी निवेश आया, और भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा.
  • सामाजिक-आर्थिक बदलाव : मध्यम वर्ग का विस्तार, नई तकनीक और उद्योगों का उदय, लेकिन असमानता भी बढ़ी.

1991 का संकट सिखाता है कि अस्थिर नीतियां, भारी कर्ज और बाहरी झटके कितने खतरनाक हो सकते हैं. साथ ही, यह साहसिक सुधारों की ताकत भी दिखाता है. फिल्म गवर्नर इसी ‘साइलेंट सेवियर’ की कहानी है – वो नौकरशाह और नेता जो स्पॉटलाइट से दूर रहकर देश को बचाने में लगे.

आज जब भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तब 1991 की याद हमें सतर्क रहने और सुधारों की राह पर चलते रहने की प्रेरणा देती है. संकट अक्सर नई शुरुआत का कारण बनता है- 1991 इसका जीवंत उदाहरण है.

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-भारत एक्सप्रेस



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