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जब टीवी मतलब सिर्फ ‘दूरदर्शन’ हुआ करता था, जानिए कैसे आधी आबादी ने सींचा देश का पहला चैनल

जब हम दूरदर्शन के इतिहास को याद करते हैं, तो हमारे जेहन में कुछ जाने-पहचाने चेहरे और पुरानी सिग्नेचर ट्यून घूम जाती है. लेकिन उस कैमरे के पीछे, उस कंट्रोल रूम की धुंधली रोशनी में और उन भारी-भरकम मशीनों के बीच काम करने वाली महिलाओं का पसीना इस इतिहास का सबसे मजबूत स्तंभ है.

क्या आपको याद है वो दौर जब घरों में टीवी होना किसी शान की बात हुआ करती थी? और उस वक्त टीवी पर सिर्फ ‘दूरदर्शन’ नाम गूंजता था. आज भले ही हमारे पास सैकड़ों चैनल और सोशल मीडिया की आंधी हो, लेकिन देश के इस पहले सरकारी चैनल की यादें आज भी कई दिलों में जिंदा हैं. आज यानी 15 सितंबर को ही हमारे देश में टेलीविजन की नींव पड़ी थी. जरा सोचिए, 15 सितंबर 1959 को जब दिल्ली के एक छोटे से स्टूडियो से इसकी शुरुआत हुई थी, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह कभी देश की धड़कन बन जाएगा. यूनेस्को की मदद से शुरू हुआ ‘टेलीविजन इंडिया’ का वह सफर आज विशालकाय ‘प्रसार भारती’ बन चुका है.

लेकिन इस पूरे सफर के पीछे असली ताकत किसकी थी? कैमरे के आगे मुस्कराने वाले चेहरे तो सबने देखे, पर पर्दे के पीछे पसीना बहाने वाली महिलाओं का योगदान क्या था? इसी सवाल का बेहद खूबसूरत जवाब देती है संगीता अग्रवाल की नई किताब‘दूरदर्शन : आधी आबादी की सशक्त गाथा’ जिसे वाणी प्रकाशन ने 2025 में प्रकाशित किया है.

आकाशवाणी से दूरदर्शन तक: संघर्ष और भरोसे की कहानी

शुरुआत में यह सेवा हफ्ते में कुछ ही दिन और कुछ घंटों के लिए चलती थी. धीरे-धीरे वक्त बदला, 1976 में यह आकाशवाणी से अलग हुआ और ‘दूरदर्शन’ बन गया. लेखिका संगीता अग्रवाल ने अपनी इस किताब में इसी पूरे इतिहास को एक बिल्कुल नए और अनोखे नजरिए से टटोला है और वह है महिलाओं का नजरिया.

आजादी के बाद जब देश को जोड़ने के लिए किसी बड़े जरिए की जरूरत थी, तब इन मीडिया संस्थानों ने एक मजबूत पुल का काम किया. इस किताब की सबसे खास बात यह है कि इसमें सिर्फ इतिहास की तारीखें नहीं हैं, बल्कि उन तमाम महिलाओं के संघर्ष और समर्पण की कहानियां हैं जिन्होंने इस संस्थान को सींचा है.

पर्दे के आगे और पीछे महिलाओं का योगदान

किताब की लेखिका ने न्यूज रीडिंग से लेकर प्रोग्राम प्रोडक्शन, एडमिनिस्ट्रेशन और तकनीकी विभागों तक हर मोर्चे पर महिलाओं की भूमिका को बेहद बारीकी से उभारा है. चाहे वह आवाज का जादू बिखेरना हो या फिर पर्दे के पीछे बैठकर पूरी व्यवस्था को संभालना, महिलाओं ने हर जगह अपनी काबिलियत साबित की है.

इस किताब को सबसे खास बनाते हैं इसके अंदर दिए गए इंटरव्यू. स्वर्गीय प्रतिमा पुरी को छोड़कर, उस दौर की लगभग सभी दिग्गज और सम्मानित महिलाओं की बातचीत इसमें शामिल है. ये इंटरव्यू किसी कागजी दस्तावेज जैसे नहीं लगते, बल्कि ऐसा महसूस होता है जैसे वे खुद बैठकर अपने पुराने संघर्षों और कामयाबी की कहानियां सुना रही हों.

क्यों पढ़नी चाहिए यह किताब?

आज के युवा शायद इस बात पर यकीन न करें कि कभी टीवी पर दिन में कुछ ही घंटे कार्यक्रम आते थे और लोग परिवार के साथ बैठकर उसे देखते थे. 1959 के उस छोटे से ट्रांसमीटर से लेकर आज के इस डिजिटल और मल्टी-चैनल दौर तक, दूरदर्शन ने देश के विकास को बहुत करीब से देखा है.

संगीता अग्रवाल इससे पहले भी कृषि और मीडिया में महिलाओं के योगदान पर लिख चुकी हैं. इस बार उन्होंने ब्रॉडकास्टिंग की दुनिया में महिला सशक्तिकरण को केंद्र में रखा है. यह किताब हमें यह याद दिलाती है कि आधी आबादी की भागीदारी के बिना न तो कोई संस्था मजबूत हो सकती है और न ही कोई राष्ट्र आगे बढ़ सकता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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