इतिहास में 6 नवंबर की तारीख विज्ञान और मानवता दोनों के लिहाज से बेहद अहम मानी जाती है. इसी दिन 1944 में अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में स्थित बेहद गोपनीय हैनफोर्ड साइट पर बी रिएक्टर के जरिए हथियार बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्लूटोनियम का उत्पादन शुरू हुआ था. यह दुनिया का पहला बड़े पैमाने पर प्लूटोनियम तैयार करने वाला रिएक्टर था. आगे चलकर इसी रिएक्टर में तैयार प्लूटोनियम का इस्तेमाल जापान के नागासाकी शहर पर गिराए गए परमाणु बम ‘फैट मैन’ में किया गया. इस घटना ने न सिर्फ दूसरे विश्व युद्ध की दिशा को प्रभावित किया, बल्कि दुनिया को परमाणु हथियारों के एक ऐसे दौर में पहुंचा दिया, जिसका असर आज भी देखा जा सकता है.
क्या था मैनहट्टन प्रोजेक्ट और क्यों बनाया गया बी रिएक्टर?
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका को डर था कि कहीं जर्मनी उससे पहले परमाणु बम बनाने में कामयाब न हो जाए. इसी आशंका के चलते अमेरिका ने ब्रिटेन और कनाडा के सहयोग से मैनहट्टन प्रोजेक्ट शुरू किया. इसका मकसद परमाणु हथियार विकसित करना था. इस मिशन के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसे रेडियोएक्टिव पदार्थ का उत्पादन करना था, जिसका इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में किया जा सके.
वैज्ञानिकों के सामने यूरेनियम-235 को प्राकृतिक यूरेनियम से अलग करने का विकल्प था, लेकिन यह प्रक्रिया काफी मुश्किल और खर्चीली थी. ऐसे में उन्होंने दूसरा रास्ता निकाला. प्राकृतिक यूरेनियम में मौजूद यूरेनियम-238 पर न्यूट्रॉन की बमबारी करके प्लूटोनियम-239 तैयार करने की तकनीक विकसित की गई. इसी काम को बड़े स्तर पर करने के लिए हैनफोर्ड में बी रिएक्टर बनाया गया.
इस रिएक्टर का निर्माण ड्यूपॉन्ट कंपनी ने किया था. इसका डिजाइन वैज्ञानिक एनरिको फर्मी के शुरुआती परमाणु प्रयोगों और ओक रिज के एक्स-10 ग्रेफाइट रिएक्टर से मिली तकनीकी जानकारी पर आधारित था. बी रिएक्टर में ग्रेफाइट का इस्तेमाल न्यूट्रॉन की गति नियंत्रित करने के लिए किया जाता था, जबकि इसे ठंडा रखने के लिए पानी का सहारा लिया गया. इसमें यूरेनियम से भरी एल्युमिनियम ट्यूब लगाई गई थीं, जिनमें कोलंबिया नदी का पानी प्रवाहित होता था.
सितंबर में हुआ था रिएक्टर का पहला बड़ा परीक्षण
बी रिएक्टर में ईंधन भरने का काम 13 सितंबर 1944 से शुरू हुआ था. इसके बाद 26 सितंबर 1944 को रिएक्टर पहली बार क्रिटिकल हुआ. यानी इसमें परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया लगातार चलने लगी. इसके बाद प्लूटोनियम उत्पादन की दिशा में काम आगे बढ़ा. 6 नवंबर 1944 को हथियारों में इस्तेमाल होने वाले प्लूटोनियम के उत्पादन की शुरुआत से जोड़ा जाता है.
इस प्रक्रिया में तैयार यूरेनियम स्लग को रिएक्टर से निकालकर आगे प्रोसेसिंग के लिए भेजा जाता था. पहले विकिरणित स्लग क्रिसमस 1944 के दिन निकाले गए. इसके बाद फरवरी 1945 में तैयार किया गया पहला प्लूटोनियम लॉस एलामोस पहुंचा, जहां परमाणु बम विकसित करने का काम चल रहा था.
हैनफोर्ड साइट की सबसे हैरान करने वाली बात यहां बरती गई गोपनीयता थी. इस विशाल परियोजना में हजारों कर्मचारी, मजदूर और तकनीकी विशेषज्ञ काम कर रहे थे, लेकिन उनमें से बेहद कम लोगों को पता था कि आखिर तैयार क्या किया जा रहा है.
ज्यादातर कर्मचारियों को सिर्फ इतना बताया गया था कि वे देश के युद्ध प्रयासों में योगदान दे रहे हैं. उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि उनके काम का संबंध परमाणु बम बनाने से है. यहां तक कि आसपास रहने वाले लोगों को भी इस परियोजना की वास्तविकता के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी. सुरक्षा के इतने कड़े इंतजाम थे कि पूरी साइट की गतिविधियां लंबे समय तक दुनिया की नजरों से दूर रहीं.
प्लूटोनियम ने बदल दिया युद्ध और दुनिया का भविष्य
प्लूटोनियम (Pu) परमाणु क्रमांक 94 वाला एक रेडियोएक्टिव तत्व है, जो प्रकृति में बेहद कम मात्रा में मिलता है. बी रिएक्टर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इस तत्व का उत्पादन औद्योगिक स्तर पर संभव हो पाया.
हैनफोर्ड में तैयार प्लूटोनियम का इस्तेमाल 16 जुलाई 1945 को अमेरिका के पहले परमाणु परीक्षण ट्रिनिटी टेस्ट में किया गया. इसके बाद 9 अगस्त 1945 को जापान के नागासाकी शहर पर गिराए गए ‘फैट मैन’ परमाणु बम में भी इसी तरह तैयार प्लूटोनियम का इस्तेमाल हुआ. इस हमले में हजारों लोगों की जान गई और बड़ी संख्या में लोग विकिरण के प्रभाव से लंबे समय तक प्रभावित रहे.
परमाणु हथियारों के विकास ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया की राजनीति और सैन्य रणनीति को भी पूरी तरह बदल दिया. शीत युद्ध के दौरान हैनफोर्ड में प्लूटोनियम का उत्पादन और बढ़ाया गया, जिससे परमाणु हथियारों की होड़ को और गति मिली.
आज भी इतिहास की याद दिलाता है बी रिएक्टर
जिस बी रिएक्टर ने परमाणु हथियारों के इतिहास में अहम भूमिका निभाई, उसे आज एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है. इसे नेशनल हिस्टोरिक लैंडमार्क का दर्जा मिला हुआ है. इसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को उस दौर की वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ-साथ उनके विनाशकारी परिणामों से भी परिचित कराना है.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.




