प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सेशेल्स यात्रा ने एक बार फिर हिंद महासागर में भारत की बढ़ती भूमिका और दोनों देशों के पुराने रिश्तों को चर्चा में ला दिया है. लेकिन भारत और सेशेल्स के संबंधों की कहानी सिर्फ आज की कूटनीति तक सीमित नहीं है. इसके पीछे एक ऐसा दौर भी छिपा है, जब छोटे से द्वीपीय देश की सुरक्षा को लेकर भारत ने अहम भूमिका निभाई थी.
करीब चार दशक पहले, अप्रैल 1986 में सेशेल्स के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस-आल्बर्ट रेने भारत आए थे. उस समय उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने एक खास चिंता रखी थी. राष्ट्रपति रेने चाहते थे कि भारत अपने कुछ विशेषज्ञ अधिकारियों की एक टीम भेजे, जो सेशेल्स की सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस प्रणाली की समीक्षा कर सके. उनका मानना था कि देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने की जरूरत है, क्योंकि उस समय सेशेल्स कई तरह के बाहरी दबावों और राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा था.
शीत युद्ध की राजनीति में फंसा सेशेल्स
1976 में आजाद हुआ सेशेल्स कुछ ही वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया था. हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण बड़ी शक्तियों की नजर इस छोटे देश पर थी. 1977 में सत्ता संभालने वाले राष्ट्रपति रेने को कई बार सत्ता अस्थिर करने की कोशिशों का सामना करना पड़ा.
1978 में तंजानिया और सोवियत संघ की मदद से एक तख्तापलट की कोशिश को नाकाम किया गया. इसके बाद 1981 में दक्षिण अफ्रीका से जुड़े भाड़े के सैनिकों ने भी सत्ता बदलने की कोशिश की, जिसे “द फ्रॉथ ब्लोअर्स” के नाम से जाना गया. इस घटना ने सेशेल्स की सुरक्षा कमजोरियों को उजागर कर दिया था.
उस समय फ्रांस, अमेरिका, सोवियत संघ और अन्य देशों की गतिविधियां भी इस क्षेत्र में बढ़ रही थीं. ऐसे माहौल में राष्ट्रपति रेने को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता थी.
भारत की टीम ने किया सुरक्षा का आकलन
राष्ट्रपति रेने के अनुरोध के बाद भारत ने एक विशेषज्ञ टीम तैयार की. इस टीम में भारतीय खुफिया ब्यूरो (आईबी) के वरिष्ठ अधिकारी वप्पाला बालाचंद्रन भी शामिल थे. 1987 में यह टीम सेशेल्स पहुंची और वहां की सुरक्षा व्यवस्था का बारीकी से अध्ययन किया.
टीम के सदस्यों को वहां पहुंचकर कुछ हैरान करने वाली बातें पता चलीं. राष्ट्रपति भवन के बाहर सुरक्षा गार्ड मौजूद थे, लेकिन अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था बहुत कमजोर थी. राष्ट्रपति रेने ने खुद भारतीय अधिकारियों से कहा कि उन्हें अपने ही सुरक्षा कर्मियों पर पूरी तरह भरोसा नहीं है.
उन्होंने सेशेल्स में मौजूद सामाजिक और समुदाय आधारित विभाजनों का भी जिक्र किया. सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने ऐसे अधिकारियों की जरूरत बताई, जो अलग-अलग समुदायों के बीच बेहतर तालमेल बना सकें.
एक हफ्ते में तैयार हुई रिपोर्ट
भारतीय टीम ने राष्ट्रपति कार्यालय, पुलिस विभाग और अन्य सुरक्षा संस्थानों का दौरा किया. अधिकारियों ने सुरक्षा प्रशिक्षण, पुलिस की क्षमता और विदेशी ताकतों के प्रभाव का अध्ययन किया. जांच में सामने आया कि सेशेल्स की सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की जरूरत थी और विदेशी हस्तक्षेप का असर भी काफी था.
इस मिशन से जुड़ी कई घटनाएं आज भी दिलचस्प मानी जाती हैं. टीम ने एयर इंडिया की बोइंग 707 उड़ान से यात्रा की थी और उस समय क्षेत्र में सक्रिय विदेशी समूहों की गतिविधियों पर भी नजर रखी गई थी. राष्ट्रपति रेने ने भारतीय अधिकारियों के साथ बातचीत में फ्रांसीसी भूमिका और अमेरिकी रिपोर्टों का भी उल्लेख किया था.
भारतीय टीम ने करीब एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट तैयार कर प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंप दी. यह रिपोर्ट केवल सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा नहीं थी, बल्कि उस दौर की वैश्विक राजनीति में भारत की संतुलित भूमिका का उदाहरण भी थी.
पुराने भरोसे से मजबूत हुआ आज का रिश्ता
आज जब प्रधानमंत्री मोदी सेशेल्स की यात्रा करते हैं, तो यह सिर्फ वर्तमान कूटनीतिक संबंधों की बात नहीं होती, बल्कि उन पुराने विश्वासों की भी याद दिलाती है, जिन्होंने दोनों देशों को करीब लाया.
वप्पाला बालाचंद्रन, जो बाद में 26/11 मुंबई आतंकी हमलों की जांच से भी जुड़े, ने इस मिशन के अनुभवों को अपनी यादों में दर्ज किया है. सेशेल्स का यह मिशन दिखाता है कि शीत युद्ध के कठिन दौर में भी भारत ने छोटे देशों के साथ सहयोग और भरोसे की नीति अपनाई थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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