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आपातकाल के 50 साल; सत्ता, संघर्ष और लोकतंत्र की अनकही दास्तान बयां करती प्रियंवद की नई किताब

आपातकाल के 50 साल बाद प्रियंवद की किताब ‘भारतीय लोकतंत्र का कोरस’ भारतीय लोकतंत्र की उस यात्रा को सामने रखती है, जिसमें आजादी के बाद के शुरुआती उत्साह से लेकर सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण तक की कहानी दर्ज है.

आपातकाल को घोषित हुए अब आधी सदी बीत चुकी है. दूसरी ओर, भारत अपनी आजादी के आठ दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहा है. ऐसे समय में प्रियंवद की किताब ‘भारतीय लोकतंत्र का कोरस’ सिर्फ अतीत को पलटकर देखने वाली किताब नहीं लगती, बल्कि आज के लोकतंत्र को समझने का एक जरूरी जरिया बन जाती है. किताब 26 जनवरी 1950 से 12 जून 1975 तक के करीब 25 वर्षों की राजनीतिक यात्रा को सामने रखती है. यही वह दौर है, जिसमें आजाद भारत ने अपने लोकतांत्रिक ढांचे को आकार लेते देखा और धीरे-धीरे ऐसे राजनीतिक तनावों की तरफ बढ़ा, जिनका एक बड़ा पड़ाव 1975 का आपातकाल बना.

प्रियंवद हिंदी के जाने-पहचाने साहित्यकार हैं. उपन्यास और कहानियां लिखने के साथ-साथ उन्होंने इतिहास और राजनीति पर भी गंभीर काम किया है. ‘भारत विभाजन की अंतःकथा’ और ‘भारतीय राजनीति के दो आख्यान (1920-1950)’ के बाद ‘भारतीय लोकतंत्र का कोरस’ उनकी इसी ऐतिहासिक यात्रा की अगली कड़ी है.

करीब 550 से 580 पन्नों की यह किताब इतिहास को महज तारीखों, घटनाओं और नेताओं की सूची बनाकर पेश नहीं करती. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि लेखक घटनाओं को कहानी की तरह आगे बढ़ाते हैं. पाठक को लगता है कि वह सिर्फ इतिहास पढ़ नहीं रहा, बल्कि उस दौर की राजनीति, बेचैनी और सत्ता के संघर्ष को करीब से देख रहा है. हालांकि रोचकता के बावजूद तथ्य और विश्लेषण किताब के केंद्र में बने रहते हैं.

इतिहास के शोर में दब गई आवाजों पर नजर

किताब का उपशीर्षक है ‘कुछ बिसरी-बिखरी ध्वनियां’. यही शब्द पूरी किताब की दिशा को काफी हद तक समझा देते हैं. इतिहास में अक्सर सत्ता, बड़े नेताओं और महत्वपूर्ण फैसलों की आवाजें सबसे ज्यादा सुनाई देती हैं. लेकिन उनके बीच कई ऐसे लोग, घटनाएं और विचार भी होते हैं, जो धीरे-धीरे मुख्य कहानी से बाहर छूट जाते हैं.

प्रियंवद उन छूटी हुई कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करते हैं. उनका सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सत्ता में कौन था और उसने क्या फैसला लिया. सवाल यह भी है कि उस फैसले के पीछे कौन-सी परिस्थितियां थीं, दूसरे लोगों की क्या भूमिका थी और उस समय समाज तथा राजनीति के भीतर कौन-सी हलचल चल रही थी.

लेखक के लिए व्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण मूल्यों में से एक है. उनके नजरिए में इतिहास समाज की स्मृति भी है. अगर किसी समाज की स्मृति अधूरी या कमजोर हो जाए तो वह अपने वर्तमान को ठीक से समझने और भविष्य के बारे में सही फैसला लेने में भी मुश्किल में पड़ सकता है.

नेहरू से इंदिरा गांधी तक बदलती राजनीति

किताब का एक बड़ा हिस्सा जवाहरलाल नेहरू के दौर और आजाद भारत के शुरुआती लोकतांत्रिक प्रयोगों को समझने में मदद करता है. संविधान लागू होने के बाद देश ने 1951-52 में पहला आम चुनाव कराया. उस समय भारत के सामने गरीबी, अशिक्षा और सीमित संसाधनों जैसी बड़ी चुनौतियां थीं. इसके बावजूद इतनी बड़ी आबादी के बीच लोकतांत्रिक चुनाव कराना अपने आप में ऐतिहासिक प्रयोग था.

किताब इस दौर के कई दिलचस्प प्रसंगों के जरिए बताती है कि कैसे एक ऐसी व्यवस्था खड़ी हो रही थी, जिसमें कांग्रेस का दबदबा जरूर था, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी मजबूत करने की कोशिश चल रही थी. नेहरू के राजनीतिक व्यक्तित्व के साथ उनके निजी जीवन की झलकियां भी सामने आती हैं. कमला नेहरू के साथ उनके संबंधों जैसे प्रसंग राजनीति के पीछे मौजूद व्यक्ति को समझने का एक अलग रास्ता खोलते हैं.

फिर कहानी 1962 के भारत-चीन युद्ध की ओर बढ़ती है. यह युद्ध सिर्फ सीमा पर हुई सैन्य हार की कहानी नहीं था. इसने भारत की रणनीतिक और प्रशासनिक कमजोरियों को भी उजागर किया और देश की राजनीति पर गहरा असर डाला. दलाई लामा से जुड़े घटनाक्रम और चीन के साथ बढ़ते तनाव के संदर्भ में उस समय के फैसलों को देखने की कोशिश किताब में की गई है.

इसके बाद भारतीय राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे इंदिरा गांधी की ओर खिसकता दिखाई देता है. कभी ‘नन्हीं छोकरी’ कही जाने वाली इंदिरा गांधी आगे चलकर कांग्रेस और देश की राजनीति की सबसे ताकतवर शख्सियतों में शामिल होती हैं. ‘गूंगी गुड़िया’ से ‘दुर्गा’ तक उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व में आया बदलाव भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित रूपांतरणों में रहा है. किताब इस बदलाव को सिर्फ राजनीतिक घटनाओं से नहीं, बल्कि सत्ता, परिवार, संगठन और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के रिश्ते से जोड़कर देखती है.

कांग्रेस का विभाजन और सत्ता का बदलता चरित्र

इंदिरा गांधी के दौर में कांग्रेस के भीतर बढ़ता संघर्ष और पार्टी का विभाजन भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ था. सत्ता के भीतर चल रही खींचतान, पुराने नेतृत्व और नए राजनीतिक समीकरणों के बीच टकराव तथा इंदिरा गांधी की बढ़ती ताकत ने राजनीति का पूरा ढांचा बदल दिया.

किताब इस दौर को सिर्फ इंदिरा गांधी के उभार की कहानी नहीं मानती. इसके पीछे मौजूद सत्ता-संघर्ष और राजनीतिक संस्थाओं पर पड़ने वाले प्रभावों को भी सामने लाती है. यही वह बिंदु है जहां किताब का सवाल और बड़ा हो जाता है—क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम है, या फिर इसके लिए सत्ता पर कुछ सीमाएं और संस्थाओं के बीच संतुलन भी जरूरी है?

1971 का युद्ध और बांग्लादेश का जन्म

1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश का जन्म भी किताब के महत्वपूर्ण हिस्सों में है. यह केवल सैन्य संघर्ष नहीं था. इसके पीछे क्षेत्रीय राजनीति, कूटनीति और उस समय की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी जुड़ी थीं.

भारत की भूमिका और इंदिरा गांधी के नेतृत्व ने उन्हें देश के भीतर बेहद मजबूत राजनीतिक स्थिति में पहुंचाया. लेकिन सत्ता जितनी मजबूत होती गई, उतने ही गंभीर सवाल भी सामने आने लगे. यही विरोधाभास किताब के आख्यान को दिलचस्प बनाता है—एक तरफ राष्ट्रीय उपलब्धियां और मजबूत नेतृत्व, दूसरी तरफ लोकतांत्रिक संस्थाओं और स्वतंत्रता को लेकर बढ़ती चिंताएं.

जेपी आंदोलन और ‘संपूर्ण क्रांति’

कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते जयप्रकाश नारायण और उनके ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन तक पहुंचती है. जेपी और इंदिरा गांधी के संबंधों का बदलता स्वरूप इस दौर को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. एक समय के राजनीतिक सहयोग और सम्मान से लेकर तीखे विरोध तक की यह यात्रा बताती है कि राजनीति में रिश्ते किस तरह बदलते हैं और परिस्थितियां किस तरह पुराने समीकरणों को उलट देती हैं.

जेपी आंदोलन के पीछे सिर्फ सरकार का विरोध नहीं था. इसमें व्यवस्था को बदलने की मांग भी थी. लेकिन यहां भी किताब एक असहज सवाल उठाती है—क्या हर क्रांति अंततः सत्ता हासिल करने की लड़ाई बन जाने का खतरा नहीं रखती? प्रियंवद के अनुसार, कई बार जिस राज्य-सत्ता के खिलाफ आंदोलन खड़ा होता है, सत्ता हाथ में आने के बाद वही आंदोलन उसके तौर-तरीकों को अपनाने लगता है.

जनता पार्टी का प्रयोग और जेपी आंदोलन के बाद राजनीति में ‘क्रांति’ शब्द का कमजोर पड़ जाना इसी व्यापक सवाल का हिस्सा बनकर सामने आता है.

‘भारतीय लोकतंत्र का कोरस’ की असली ताकत शायद यही है कि यह पाठक को इतिहास के साथ-साथ लोकतंत्र की बुनियादी समझ पर भी सोचने के लिए मजबूर करती है. संविधान, राजनीतिक दल, चुनाव, नेता और सरकार—ये लोकतंत्र के जरूरी हिस्से हैं, लेकिन लोकतंत्र इनसे कहीं बड़ा है.

व्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति की जगह, संस्थाओं की स्वायत्तता, सत्ता की जवाबदेही और संवैधानिक संतुलन भी उतने ही जरूरी हैं. जब इनमें से किसी एक पर लगातार दबाव बढ़ता है तो लोकतंत्र का ढांचा ऊपर से मजबूत दिखाई देने के बावजूद भीतर से कमजोर हो सकता है.

डॉ. भीमराव आंबेडकर की लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर दी गई चेतावनियों को भी किताब के संदर्भ में नए सिरे से देखने का मौका मिलता है. सत्ता के प्रति बढ़ती लालसा, राजनीतिक स्वार्थ और संस्थागत कमजोरियां किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन सकती हैं.

आज के दौर में किताब की प्रासंगिकता

आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ और आजादी के आठ दशकों के इस दौर में यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह अतीत को सिर्फ याद करने के लिए नहीं, उससे सीखने के लिए सामने रखती है. इतिहास को भूलना आसान है, खासकर तब जब उसकी घटनाएं धीरे-धीरे किताबों के कुछ अध्यायों तक सीमित हो जाएं. लेकिन लोकतंत्र की कमजोरियां तभी समझ में आती हैं, जब समाज अपनी पुरानी गलतियों और संघर्षों को याद रखता है.

प्रियंवद की किताब इसी सामूहिक स्मृति को बचाने की कोशिश करती है. यह न तो केवल नेताओं की कहानी है और न ही घटनाओं का सूखा विवरण. यह उस भारत की कहानी है जो आजादी के बाद लोकतंत्र को सीख रहा था, संस्थाएं बना रहा था, गलतियां कर रहा था और सत्ता की ताकत तथा नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन तलाश रहा था.

युवा पाठकों के लिए इसकी खास अहमियत है. जिन लोगों ने आपातकाल या उसके पहले के राजनीतिक दौर को देखा नहीं है, उनके लिए ऐसी किताबें उस समय की परिस्थितियों को समझने का अवसर देती हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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