झारखण्डे राय की पुरानी शैली की तस्वीर, पीछे गांव, किसान और लाल झंडे का भावुक ऐतिहासिक दृश्य, PC-@Chatgpt
आजादी के बाद के भारत में भी जब सत्ता और पद के आकर्षण में नेता अक्सर सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं, तब झारखण्डे राय जैसे नेताओं की याद आना स्वाभाविक है. एक बार मंत्री, सात बार सांसद और चार बार विधायक रहे इस जननेता ने आजादी के बाद भी गरीबों और मजदूरों की आवाज उठाने के लिए अठारह बार जेल की यात्रा की. ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें कुल इक्कीस साल का कारावास सुनाया था.
उनकी ईमानदारी इतनी गहरी थी कि दिल्ली में निधन होने पर शव को गांव लाने के पैसे तक नहीं थे. बेटे अशोक को लोगों से चंदा मांगकर पार्थिव शरीर अमिला लाना पड़ा. शुभचिंतकों ने जब उनके बैंक खातों को खंगाला तो उसमें फूटी कौड़ी तक नहीं मिली.
क्रांतिकारी पृष्ठभूमि(The Story of Jharkhande Rai)
झारखण्डे राय का जन्म 1914 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अमिला गांव में एक जमींदार परिवार में हुआ. मेधावी और वैचारिक छात्र के रूप में उनकी शुरुआती शिक्षा गवर्नमेंट हाईस्कूल बस्ती और जुबली हाईस्कूल गोरखपुर में हुई. उच्च शिक्षा के लिए वे इलाहाबाद गए, जहां इविंग क्रिश्चियन कॉलेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई की. यहीं वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एचएसआरए) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) से जुड़े और सक्रिय भूमिका निभाई.
ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें आठ साल का कारावास भोगना पड़ा. 1938 में पिपरीडीह ट्रेन डकैती में वे कामरेड जय बहादुर सिंह, मुक्तिनाथ उपाध्याय, कृष्णदेव राय, जामिल अली और इश्तेयाक आब्दी के साथ शामिल थे. इस कार्रवाई में इस्तेमाल बंदूक इश्तेयाक आब्दी अपने पिता से चुराकर लाए थे, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने. गाजीपुर हथियार षड्यंत्र केस और लखनऊ षड्यंत्र केस में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कुल इक्कीस साल की सजा सुनाई, लेकिन आजादी के बाद वे इन मामलों से रिहा हो गए.
किसान संघर्ष और जमींदारी उन्मूलन
जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद झारखण्डे राय ने जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए शोषितों, मजदूरों और किसानों को संगठित किया. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान किसान सभा की गतिविधियों से गहरे जुड़े. सामंतों और ब्रिटिश शासन के खिलाफ गांव-गांव में किसानों को एकजुट किया. 1939 में गाजीपुर में किसान सभा के कार्यालय से प्रतिबंधित साहित्य रखने के आरोप में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया. 1940-41 में देवरीकांड के दौरान उन्हें नजरबंद भी किया गया.
कामरेड जय बहादुर सिंह और सरजू पांडे के साथ किसान सभा के माध्यम से उन्होंने बड़ी संख्या में किसानों को जोड़ा. पूर्वांचल के सभी जिलों में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार उनके जीवन का मिशन बन गया. दिग्गज कम्युनिस्ट नेता जय बहादुर सिंह के निधन के बाद पूर्वांचल में लाल झंडे की कमान उनके हाथ में आ गई.
संसद और मंत्रिमंडल में उनकी मौजूदगी
घोसी सीट से सात बार सांसद और चार बार विधायक चुने गए झारखण्डे राय लोकसभा में हमेशा गरीबों और किसानों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे. 1967 में चौधरी चरण सिंह की सरकार में खाद्य एवं रसद मंत्री बने. इस दौरान उन्होंने गन्ना किसानों को लाभ दिलाने के लिए पूर्वांचल में चीनी मिलों की स्थापना का प्रयास किया और किसानों को गन्ने की खेती के लिए प्रेरित किया. उस समय पूर्वी पट्टी में तारपीन से राब (चीनी) बनाने का चलन बढ़ा. चाय में गुड़ की जगह चीनी के प्रयोग को लोग ‘झारखंडी चाय’ कहने लगे. चायखानों और दुकानों पर अक्सर सुनाई देता—“भाई! झारखंडी चाय पिलाओ.”
भूमिहीनों को भूमि वितरण के मुद्दे पर सरकार से मतभेद होने पर उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. सिद्धांतों से रत्ती भर समझौता नहीं किया.
सादगी और वैचारिक विरासत
उनका पूरा जीवन सादगी का पर्याय था. अपना काम खुद करना पसंद था—यहां तक कि कुर्ता-धोती भी खुद धोते, सूखने पर तह करके तकिया के नीचे रखते और अगले दिन पहनते. किताबों से गहरा लगाव था. क्रांतिकारियों पर कई पुस्तकें लिखीं-‘अगस्त विद्रोह’, ‘क्रांतिकारी जनवादी’, ‘भूमि सुधार और भूमि आंदोलन’, ‘गोपालन के नाम खुला पत्र’, ‘क्रांतिकारियों के संस्मरण’, ‘पंतशाही को चुनौती’, ‘भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन: एक विश्लेषण’ और ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ आदि. कार्यकर्ताओं को भी किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे.
लखनऊ में पेपर मिल कॉलोनी में रहते हुए बिना किसी तामझाम के लोगों से मिलते और मदद करने में कभी संकोच नहीं करते थे. चिट्ठियां लिखने का विशेष शौक था. जिस स्थान से लिखते, उसका उल्लेख जरूर करते-“फलां ट्रेन से चिट्ठी…”.
18 मार्च 1987 को दिल्ली में निधन होने पर यह जननेता भारत माता की गोद में चिरनिद्रा में सो गया. आज भी उनका घर खंडहर से ज्यादा कुछ नहीं है. कामरेड जय बहादुर सिंह के बाद आजमगढ़ में वामपंथी जमीन को सींचने वाले झारखण्डे राय की जिंदगी याद दिलाती है कि सच्ची राजनीति पद और संपत्ति से नहीं, सिद्धांतों और जनता की सेवा से परिभाषित होती है. उनकी अर्थी भी चंदे से उठी-यह तथ्य उनकी ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण है.
-भारत एक्सप्रेस
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