मैडम भीकाजी कामा
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी सिर्फ देश की गलियों, जेलों और आंदोलनों तक सीमित नहीं थी. इसकी आवाज समुद्र पार यूरोप तक भी पहुंची थी. इसी आवाज को बुलंद करने वाली प्रमुख हस्तियों में मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है. 22 अगस्त 1907 का दिन उनके जीवन और भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के इतिहास में खास महत्व रखता है. इसी दिन जर्मनी के स्टटगार्ट में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन के मंच से भारत की आजादी की मांग दुनिया के सामने रखी और एक भारतीय झंडा फहराया.
उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और देश में आजादी की मांग धीरे-धीरे जोर पकड़ रही थी. लेकिन विदेश की धरती पर खड़े होकर भारत की स्वतंत्रता की बात करना अपने आप में बड़ा साहस था. मैडम कामा ने यही साहस दिखाया. सम्मेलन में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए प्रतिनिधियों के सामने उन्होंने भारतीय झंडे को ऊंचा उठाया. इस झंडे में हरा, केसरिया और लाल रंग था और बीच में ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ था.
यह आज का आधिकारिक तिरंगा नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दौर में इस्तेमाल किए गए राष्ट्रीय प्रतीकों में से एक था. फिर भी उस समय इसका संदेश बेहद साफ था. भारत अपने भविष्य का फैसला खुद करना चाहता है.
मैडम कामा ने अपने भाषण में भारत की राजनीतिक स्थिति का जिक्र करते हुए स्वतंत्रता और समानता की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई को दुनिया में चल रहे न्याय और बराबरी के संघर्ष से जोड़ने की कोशिश की. उनके लिए यह सिर्फ ब्रिटिश शासन का विरोध नहीं था, बल्कि उन अधिकारों की मांग भी थी जिन्हें हर देश और हर इंसान पाने का हक रखता है.
विदेश में रहकर भी भारत के लिए संघर्ष
भीकाजी कामा का जन्म 1861 में बंबई के एक संपन्न पारसी परिवार में हुआ था. वे पढ़ी-लिखी और अपने समय के मुकाबले काफी प्रगतिशील विचारों वाली महिला थीं. ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की हालत और आम लोगों की परेशानियों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया.
बाद में वे विदेश चली गईं और लंदन तथा पेरिस में रहीं. यूरोप में रहते हुए उनका संपर्क भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं और क्रांतिकारियों से हुआ. श्यामजी कृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर जैसे लोगों के साथ उनके संबंधों ने उनके राजनीतिक काम को और मजबूत किया.
उन्होंने विदेश से भारत की आजादी के समर्थन में साहित्य और राजनीतिक सामग्री तैयार करने तथा उसे लोगों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई. उस दौर में संचार के साधन आज जैसे आसान नहीं थे. भारत की खबरें और ब्रिटिश शासन की नीतियों को दुनिया तक पहुंचाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण काम था. इसके बावजूद मैडम कामा ने इस काम को जारी रखा.
स्टटगार्ट सम्मेलन उनके इसी प्रयास का एक बड़ा पड़ाव बना. वहां झंडा फहराने का उनका कदम सिर्फ एक प्रतीकात्मक घटना नहीं था. यह दुनिया के सामने भारत की स्वतंत्रता की मांग को सार्वजनिक रूप से रखने का मौका भी था.
महिलाओं की भूमिका को मिली नई पहचान
मैडम कामा की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दौर भारतीय महिलाओं के लिए आसान नहीं था. विदेश जाकर राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना और फिर किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़े होकर भारत की आजादी की बात करना बेहद असाधारण कदम था.
उन्होंने यह दिखाया कि स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका केवल पर्दे के पीछे तक सीमित नहीं थी. वे विचार रखने, संगठन बनाने, प्रचार करने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की आवाज उठाने में भी आगे आ सकती थीं.
आज जब हम राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान के साथ देखते हैं, तो उसके पीछे छिपे लंबे संघर्ष को याद करना जरूरी है. उस संघर्ष में ऐसे कई लोग थे जिन्होंने अलग-अलग समय और अलग-अलग जगहों से आजादी की आवाज को मजबूत किया. मैडम भीकाजी कामा उन्हीं साहसी लोगों में शामिल थीं.
ये भी पढ़ें- रसोई से गायब होने वाली है चीनी? 30 दिन में 21% महंगी, पीछे इथेनॉल नहीं कोई और खेल
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

