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पानी का शाप या कुप्रबंधन का परिणाम? बिहार की त्रासद विरासत पर डॉ. दिनेश कुमार मिश्र का बड़ा खुलासा

बिहार में पानी कभी सिर्फ जीवन का स्रोत नहीं रहा, वह एक विरोधाभास है जहां एक ही समय में बाढ़ और सुखाड़ दोनों मौजूद रहते हैं. यह प्रकृति का दोष नहीं, बल्कि हमारी नीतियों और समझ की सीमाओं का परिणाम है.

आज विश्व जल दिवस. संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाने वाला यह दिन हमें याद दिलाता है कि पानी जीवन का आधार है, लेकिन सही प्रबंधन के अभाव में यह अभिशाप भी बन सकता है. भारत में, खासकर बिहार में, पानी का यह दोहरा स्वरूप सदियों से देखा जाता रहा है. कभी बाढ़ के रूप में तबाही लाता है तो कभी सूखे के रूप में फसलें सूखा देता है. ठीक इसी संदर्भ में राजकमल प्रकाशन द्वारा हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘पानी का शाप: बिहार में बाढ़-सुखाड़’ (1947-1956) एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बनकर उभरती है. लेखक डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की यह कृति न केवल बिहार के जल इतिहास को उजागर करती है, बल्कि विश्व जल दिवस के संदेश को और गहराई देती है—कि पानी को शाप बनने से बचाने के लिए हमें इतिहास से सीखना होगा.

लेखक: एक इंजीनियर से बाढ़-मुक्ति के योद्धा तक

डॉ. दिनेश कुमार मिश्र मूल रूप से सिविल इंजीनियर हैं, लेकिन कोसी नदी की एक बाढ़ ने उनका जीवन बदल दिया. 1992 से वे बिहार के गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन में काम कर रहे हैं. उन्होंने ‘बाढ़ मुक्ति आंदोलन’ की नींव रखी, जिसमें 700 से अधिक ग्रामीण समूह ‘बाढ़ इतिहासकार’ के रूप में सक्रिय हैं. उनकी पूर्ववर्ती पुस्तकें जैसे ‘बाढ़ से ग्रस्त’, ‘बगमती की सद्गति’, ‘ट्रैप्ड! बिटवीन द डेविल एंड डीप वॉटर्स’ और ‘ऋणजल-धनजल’ बिहार की बाढ़ समस्या पर गहन शोध का परिणाम हैं. ये किताबें न केवल बाढ़ नियंत्रण की पारंपरिक नीतियों (जैसे तटबंध) की आलोचना करती हैं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, समुदाय भागीदारी और ‘नदियों के साथ जीने’ की वकालत करती हैं.

‘पानी का शाप’ उनकी नई कृति है, जो 2026 में राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुई (ISBN: 978-9360863494, 434 पृष्ठ). यह एक श्रृंखला की पहली पुस्तक है, जिसमें लेखक 1947-1956 के दशक पर केंद्रित हैं—स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में बिहार की जल-आपदाओं का विस्तृत अध्ययन. प्रकाशक की ओर से इसे “प्राकृतिक आपदा, समाज और शासन व्यवस्था के अंतर्संबंधों का ऐतिहासिक दस्तावेज़” कहा गया है.

पानी का अभिशाप कैसे बना?

पुस्तक का शीर्षक ही सब कुछ कह देता है ‘पानी का शाप’. बिहार में पानी न तो केवल वरदान है और न ही केवल आपदा. लेखक 1947 से 1956 तक के ऐतिहासिक दस्तावेजों, सरकारी रिपोर्टों, समाचार पत्रों और स्थानीय गवाहियों के आधार पर बताते हैं कि स्वतंत्रता के बाद भी ब्रिटिश काल की बाढ़-नियंत्रण नीतियां कैसे जारी रहीं. इस दशक में बिहार की नदियों—कोसी, गंडक, बागमती और अन्य—ने बार-बार बाढ़ लाई, जबकि कुछ क्षेत्रों में सूखा और अकाल ने किसानों को बर्बाद किया. लेखक की शैली मिश्रित है. ऐतिहासिक विश्लेषण, सामाजिक प्रभाव और शासन की आलोचना.

प्राकृतिक आपदा और समाज: बाढ़ ने लाखों परिवारों को विस्थापित किया, फसलें नष्ट कीं, लेकिन समाज ने इसे ‘ईश्वर की मर्जी’ मानकर स्वीकार कर लिया. लेखक स्थानीय ‘बाढ़ इतिहासकारों’ के माध्यम से उन कहानियों को जीवंत करते हैं जो आधिकारिक रिपोर्टों में गायब हैं.

  • शासन की भूमिका : स्वतंत्र भारत की सरकारें तटबंध बनाने, नहरें खोदने और राहत कार्यों में लगी रहीं, लेकिन ये प्रयास असफल साबित हुए. लेखक प्रमाणों के साथ बताते हैं कि कैसे तटबंधों ने नदियों को बांधकर समस्या को और बढ़ाया—पानी का बहाव रुक गया, जलजमाव बढ़ा और सूखे के क्षेत्रों में पानी की कमी हो गई.
  • दोहरी आपदा : पुस्तक बाढ़ और सुखाड़ दोनों को एक साथ जोड़ती है. 1947-56 का दौर बिहार के लिए ‘पानी का संकट’ था—कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि. यह दिखाता है कि जल प्रबंधन में ‘एक आकार सभी के लिए’ वाली नीति कितनी खतरनाक है.

डॉ. मिश्र की शोध गहराई उल्लेखनीय है. वे कहते हैं कि बाढ़ ‘अनिवार्य’ नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है. उनकी पिछली किताबों की तरह यहां भी वे बड़े बांधों और नेपाल में प्रस्तावित परियोजनाओं की आलोचना करते हैं, जबकि स्थानीय समाधान जैसे पुराने तालाबों का पुनरुद्धार, नदियों को खुला छोड़ना और समुदाय-आधारित चेतावनी प्रणाली की वकालत करते हैं.

विश्व जल दिवस के संदर्भ में प्रासंगिकता

विश्व जल दिवस 2026 का थीम (जल संकट से निपटने के लिए नवाचार और सहयोग) इस पुस्तक से पूरी तरह मेल खाता है. बिहार आज भी भारत का सबसे बाढ़-प्रभावित राज्य है—हर साल लाखों लोग प्रभावित होते हैं, जलवायु परिवर्तन इसे और गंभीर बना रहा है. ‘पानी का शाप’ हमें याद दिलाती है कि 1947-56 की गलतियां आज भी दोहराई जा रही हैं. यदि हम तटबंधों और बड़े प्रोजेक्टों पर ही निर्भर रहेंगे, तो पानी शाप ही बना रहेगा.

लेखक का संदेश स्पष्ट है—पानी को मां का दर्जा दो, उसे शोक या संसाधन मत बना. समुदाय, सरकार और वैज्ञानिकों को मिलकर ‘नदियों के साथ जीना’ सीखना होगा. यह पुस्तक सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की राह भी दिखाती है: जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदी-जोड़ परियोजनाएं और स्थानीय ज्ञान का सम्मान.

पढ़िए और सोचिए

‘पानी का शाप’ राजकमल प्रकाशन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. यह उन पाठकों के लिए अनिवार्य है जो पर्यावरण, इतिहास, सामाजिक न्याय या जल प्रबंधन में रुचि रखते हैं. डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की यह कृति न केवल बिहार को समझने का माध्यम है, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी भी. विश्व जल दिवस पर हम संकल्प ले सकते हैं कि पानी का शाप हमारी पीढ़ी में खत्म हो जाए—इसे वरदान बनाएं. पढ़िए, चर्चा कीजिए और जल संरक्षण की मुहिम में शामिल हों. पानी बचा, तो जीवन बचा!

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