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फूलन देवी: बीहड़ से बुलंदी तक…बेखौफ सफर

चंबल के बीहड़ों से संसद तक पहुंचने वाली दस्यु सुंदरी फूलन देवी के बारे में कई किताबें लिखी गईं. उनके उपर तमाम बायोपिक डाक्युमेन्ट्री बनीं लेकिन उनके बचपन से जुड़े कई ऐसे रोचक किस्से हैं जिनके बारे में शायद कम ही लोग जानते होंगे.

Phoolan Devi

फूलन देवी

Edited by Akansha

एक बहुचर्चित फिल्म का मशहूर डॉयलाग है…ए फूल समझा है क्या, अपन फायर है…वो भी फायर ही थी, ऐसी फायर जिसने अपने वक्त के बड़े-बड़े रहइशों को ही नहीं, बल्कि कई सरकारों और पुलिस अधिकारियों की नाक में दम कर रखा था. भारतीय समाज के वर्ण व्यवस्था के मुतबिक वो निचली जाति से ताल्लुक रखती थी. इसलिए निशाने पर रहते थे जमींदार, ठाकुर, राजपूत और हर वो धन्नासेठ जो समाज के निचले तबके का खून चूसने, उन्हें अपने पैरों के नीचे दबने की चेष्टा करता था.

मुफलिसी में बीता बचपन

बात हो रही है बीहड़ों की रानी, गरीबों की मसीहा और खौफ का पर्याय रही दस्यू फूलन देवी की. 10 अगस्त 1963 में फूलन देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन में एक छोटे से गांव गोरहा में हुआ. फूलन देवी की मां का नाम मूला और पिता का नाम देवीदीन था. मल्लाह परिवार में जन्मी फूलन देवी की चार बहनें और एक भाई भी था. परिवार बड़ा था और आय का साधन एक जमीन का टुकड़ा था. जो उनके चाचा और उनके बेटे ने हथिया ली थी. जिसकी वजह से उनके परिवार की स्थिति और बद्दतर होती चली गई. जमीन को लेकर एक बार फूलन देवी ने विवाद कर दिया था. जिसकी वजह से उनके माता-पिता ने उनकी शादी का निर्णय लिया और 11 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह पुत्तीलाल के साथ कर दिया गया, लेकिन कुछ वक्त बाद ही पुत्तीलाल ने उन्हें छोड़ दिया.

हालात ने थमाए हथियार

उस वक्त पितृसतात्मक समाज में महिलाओं की स्थिति बेहद कमजोर और दयनीय थी. उस वक्त पति के द्वारा छोड़ी गई महिला को हीन भाव से देखा जाता था. फूलन देवी की तत्कालीन स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी. हालात कुछ बदले इसके लिए फूलन देवी को उनके पिता ने अपने रिश्तेदार के घर रहने भेज दिया, लेकिन वहां भी कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें वापस अपने गांव आना पड़ा. जिसके बाद उनका सामना एक बार फिर जमीन को लेकर अपने चाचा के बेटे से हो गया. इस बार मसला इतना बढ़ गया कि बात पुलिस तक जा पहुंची और पुलिसकर्मियों ने फूलन देवी को पकड़ लिया. कहा जाता है इसी काल खंड में उनका यौन उत्पीड़न हुआ. इस घटना के बाद फूलन देवी डाकुओं के संपर्क में आई और उनके गिरोह का हिस्सा बन गई.

गरीबों की बनी मसीहा

डाकू बनने के बाद फूलन देवी ने अपने गिरोह के साथ मिलकर सवर्ण बहुल्य गांवों को लूटा. रेलगाड़ियों तक में लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया. वो अमीरों से पैसा छीनकर गरीबों को बांटती थी. जिससे वो हाशिये पर खड़ी जाति के लोगों में मशहूर होती चली गई और शासन-प्रशासन के लिये आंखों की किरकिरी बन गई. गरीबी में जीने वाली आज बीहड़ों में राज करने लगी थी. कारोबारी, सेठ और अमीर तबके के लोग उसके नाम सुनकर ही दहशत की गोद में जाकर बैठ जाते थे.

बेहमई हत्याकांड ने बनाया बैंडिट क्वीन

1981 में कानपुर देहात में बेहमई नरसहांर के बाद फूलन देवी के नाम के चर्चे सरकार तक में होने लगे थे. इस कांड के बाद यूपी के सीएम को अपनी कुर्सी तक गंवानी पड़ गई थी. दरअसल 14 फरवरी 1981 में यूपी के बेहमई गांव में फूलन देवी ने अपने साथ हुए शारीरिक शोषण का बदला लेते हुए 20 ठाकुरों को लाइन से खड़ा कर गोली मार दी थी. इस हत्याकांड ने फूलन देवी को पूरे देश में चर्चित कर दिया था और फूलन देवी बैंडिट क्वीन कहलाने लगी.

आत्मसमपर्ण भी रहा रोचक

फूलन देवी के सरेंडर करने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. फूलन देवी साल 1982 के अक्टूबर महीने में आत्मसमपर्ण करने के लिए तैयार हो चुकी थी. लेकिन भिंड के ऊमरी गांव में पुलिस के तैयार किये गये शांति कैंप में जो एनकाउंटर हुआ उसने फूलन को झकझोर कर रख दिया. इस एनकाउंटर में मुस्लिम नाम का एक डकैत गोली लगने से घायल हो गया था. जिसकी वजह से फूलन देवी नाराज हो गई और उसने अपने सरेंडर का मन बदल वापस बीहड़ में जाने का फैसला लिया.

भिंड एसपी राजेंद्र चतुर्वेदी जिनकी समझाइश के बाद फूलन सरेंडर करने के लिए राजी हुई थी. एक बार फिर फूलन को समझाया लेकिन वो तब भी नहीं मानी. उस वक्त एसपी ने अपना बेटा बतौर जमानत फूलन देवी को दिया था. जिसके बाद 13 फरवरी 1983 में फूलन देवी ने भिंड में पूर्व सीएम अर्जन सिंह के सामने अपना सरेंडर किया था. कहा जाता है कि फूलन देवी को उत्तर प्रदेश में अपने एनकाउंटर का डर था. इसलिए उसने मध्यप्रदेश में जाकर आत्मसमपर्ण किया और ग्वालियर जेल में ही रही.

बीहड़ से संसद का सफर

करीब 11 साल जेल में रहने के बाद साल 1994 में दया के एक अधिनियम के तहत फूलन देवी को रिहा किया. वहीं उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह यादव ने फूलन देवी पर दर्ज सभी केस वापस ले लिए. मुलायम सिंह ही वो नेता हैं जिसने फूलन देवी को साइकिल पर सवार कर दिल्ली में संसद तक पहुंचाया. नेताजी ने उन्हें मिर्जापुर से समाजवादी पार्टी के टिकट पर सांसदी का चुनाव लड़वाया. साल 1996 में फूलन देवी मिर्जापुर से जीत दर्ज कर संसद पहुंची. हालांकि 1998 में हुए लोकसभा के चुनाव में वो इसी सीट पर हार गई थी.

लेकिन 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में उन्होंने दोबारा जीत दर्ज की और एक बार फिर संसद पहुंची. साल 2001 वो साल रहा जब दस्यू सुंदरी इस दुनिया को अलविदा कर गई. शेर सिंह राणा नाम के शख्स ने दिल्ली स्थित उनके घर के बाहर उन्हें गोली मार दी थी. कहा जाता है कि शेर सिंह ने फूलन देवी की हत्या बेहमई हत्याकांड का बदला लेने के लिए की थी. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी आत्मकथा ‘ए ग्रेन ऑफ सेंड इन ऑवरग्लास ऑफ टाइम’ में फूलन देवी का जिक्र करते हुए लिखा भी है कि जो तलवार के दम पर जीते हैं…उनका अंत भी तलवार के दम पर होता है.

-भारत एक्सप्रेस 



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