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पी.वी. नरसिम्हा राव जयंती: जानिए क्यों आधुनिक भारत के असली शिल्पकार को अंतिम विदाई में भी मिला दर्द

पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की 105वीं जयंती पर आधुनिक भारत के निर्माण में उनके योगदान को याद किया जा रहा है. 1991 के भीषण आर्थिक संकट के दौरान अल्पमत सरकार का नेतृत्व करते हुए उन्होंने देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की और ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ जैसी कूटनीतिक मिसालें पेश कीं.

PV Narasimha Rao Birth Anniversary The PM Who Transformed India
Edited by Vaibhav Gupta

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीति में एक विडंबना यह रही है कि उसने अपने उन नेताओं को अक्सर किनारे कर दिया या भुला दिया, जिन्होंने पार्टी और देश दोनों के लिए सबसे ज्यादा योगदान दिया. इनमें सबसे प्रमुख नाम है पी.वी. नरसिम्हा राव का. आज उनकी 105वीं जयंती पर यह याद करना जरूरी है कि कांग्रेस का सबसे परिवर्तनकारी प्रधानमंत्री वही था, जिसे अपनी ही पार्टी ने व्यवस्थित रूप से इतिहास से मिटाने की कोशिश की.

1991 का संकट और राव का उदय

1991 में जब पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, तो भारत आर्थिक रूप से कगार पर खड़ा था. विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो चुके थे, सोना गिरवी रखना पड़ा था, राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी और कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत भी नहीं था. यह एक अल्पमत सरकार थी, लेकिन राव ने जो किया, वह कई पूर्ण बहुमत वाली सरकारों के बस की बात नहीं थी.

उन्होंने मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री को वित्त मंत्री बनाकर ‘आर्थिक उदारीकरण’ की नीति शुरू की. लाइसेंस राज का अंत, निजी क्षेत्र को बढ़ावा, विदेशी निवेश का स्वागत, ये बदलाव भारत की किस्मत बदल गए. आज भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीसरी बनने की राह पर है, तो उसकी नींव 1991 में रखी गई थी. पी.वी. नरसिम्हा राव राव ने सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं बदली, बल्कि राज्य नियंत्रण से हटकर उद्यमिता पर भरोसा की सोच बदल दी.

विदेश नीति और सुरक्षा में क्रांतिकारी बदलाव

राव की उपलब्धियां केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं थीं:

  • लुक ईस्ट पॉलिसी के जनक बने. सिंगापुर, मलेशिया, ASEAN और दक्षिण कोरिया के साथ संबंध मजबूत किए. आज का एक्ट ईस्ट पॉलिसी उन्हीं की नींव पर टिका है.
  • पश्चिम की ओर देखने वाली पहली सच्ची नीति अपनाई, लेकिन सोवियत संघ (रूस) जैसे पुराने मित्रों को भी नहीं छोड़ा. मल्टी-अलाइनमेंट की अवधारणा उन्होंने ही अमल में लाई.
  • इजरायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए, साथ ही फिलिस्तीन का समर्थन जारी रखा.
  • परमाणु कार्यक्रम: भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने की तैयारी उन्होंने की. अटल बिहारी वाजपेयी ने बाद में स्वीकार किया कि बम तैयार करने का काम राव ने किया, उन्होंने केवल परीक्षण किया.

आंतरिक सुरक्षा में भी उन्होंने पंजाब, कश्मीर और असम के संकटों से निपटा. KPS गिल जैसे अधिकारियों का समर्थन किया और स्थिति को काफी हद तक सुधारा.

कांग्रेस द्वारा अपमान और विस्मरण

कांग्रेस ने राव को कभी अपना नहीं माना. उनकी मृत्यु (2004) के बाद तो अपमान चरम पर पहुंच गया. उनके शव को दिल्ली में अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं मिली, जिसके बाद शव को हैदराबाद ले जाया गया. कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड के गेट उनके शव के लिए नहीं खुले, जबकि अन्य नेताओं के लिए खुले थे. सोनिया गांधी के आदेश की प्रतीक्षा रही, लेकिन आदेश नहीं आया.

राव ने साबित कर दिया कि कांग्रेस और सरकार ‘नेहरू-गांधी परिवार’ के बिना भी चल सकती है. उन्होंने परिवार की केंद्रीयता को चुनौती दी. इसी ‘अपराध’ की सजा उन्हें मिली. बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992) को उनकी पूरी विरासत का प्रतीक बना दिया गया, जबकि उनके शासन की अन्य उपलब्धियों को नजरअंदाज कर दिया गया.

क्यों जरूरी है राव को याद करना?

राव की विरासत कांग्रेस के लिए एक सबक है. अगर कांग्रेस उन्हें अपनाती, तो आर्थिक उदारीकरण का श्रेय वो खुद ले सकती थी, बजाय इसके कि विपक्षी दल इसे अपना बताएं. विदेश नीति की व्यावहारिकता, सुरक्षा और सुधारों का श्रेय भी कांग्रेस को मिलता. लेकिन परिवार-केंद्रित राजनीति ने पार्टी को कमजोर किया.

राव ने साबित किया कि सादगी, बौद्धिकता और दूरदृष्टि से देश को बदला जा सकता है. वे दक्षिण भारत से पहले लंबे समय तक प्रधानमंत्री बने गैर-नेहरू परिवार के नेता थे.

आज जब भारत विश्व पटल पर मजबूती से खड़ा है, तो पी.वी. नरसिम्हा राव को श्रद्धांजलि देनी चाहिए. कांग्रेस के लिए भी समय है कि वह अपनी इस भूल को सुधारे और अपने सबसे प्रभावशाली प्रधानमंत्रियों में से एक को सम्मान दे. इतिहास मिटाया नहीं जा सकता, उसे स्वीकार करना ही बुद्धिमानी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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