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महज एक नेता नहीं, सादगी की मिसाल थे भोला पासवान शास्त्री; जानिए क्यों आज भी प्रासंगिक है उनकी कहानी

बिहार की राजनीति का जिक्र आते ही अक्सर बड़े-बड़े काफिले और सत्ता का रुआब आंखों के सामने आ जाता है. लेकिन इसी बिहार की जमीन ने एक ऐसा नेता भी पैदा किया था, जिसने सत्ता के शीर्ष पर बैठकर भी फकीरी का दामन नहीं छोड़ा.

बिहार की राजनीति का जिक्र आते ही अक्सर बड़े-बड़े काफिले, लाल बत्तियां और सत्ता का रुआब आंखों के सामने आ जाता है. लेकिन इसी बिहार की जमीन ने एक ऐसा नेता भी पैदा किया था, जिसने सत्ता के शीर्ष पर बैठकर भी फकीरी का दामन नहीं छोड़ा. हम बात कर रहे हैं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय भोला पासवान शास्त्री की, जिन्हें आज भी ‘राजनीति का विदेह’ कहा जाता है.

पूर्णिया के बैरगाछी जैसे एक छोटे से गांव में जन्मे भोला बाबू ने साल 1968 से 1972 के बीच तीन बार बिहार की कमान संभाली. इसके अलावा, वे केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार में शहरी विकास मंत्री भी रहे और संसद से लेकर विधानसभा तक विपक्ष के नेता की भूमिका भी निभाई. इतने बड़े पदों पर रहने के बावजूद उनके मन में कभी सत्ता का अहंकार नहीं आया.

जब मुख्यमंत्री जाते थे पैदल दफ्तर

आज के दौर में जहां छोटे स्तर के नेताओं के साथ भी गाड़ियों का लंबा काफिला चलता है, वहीं भोला पासवान शास्त्री बिहार के इकलौते ऐसे सीएम थे जो रोजाना पैदल ही अपने दफ्तर निकल जाते थे. हैरानी की बात यह है कि उनके पास जिंदगीभर अपनी कोई निजी कार नहीं थी. इतना ही नहीं, उन्होंने कभी भी सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल अपने निजी या घर के कामों के लिए नहीं किया. उनकी सादगी का आलम यह था कि वे मिलने वाले वेतन और भत्तों का अधिकांश हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों में दान कर दिया करते थे.

जमीन से जुड़ाव और अनोखा अंदाज

भोला बाबू को दिखावे की राजनीति से सख्त चिढ़ थी. आलीशान कमेटियों या खर्चीली बैठकों के बजाय वे अक्सर किसी पेड़ के नीचे जमीन पर कंबल बिछाकर बैठ जाते थे और वहीं अधिकारियों व आम जनता की समस्याएं सुनते थे. उनकी सादगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के ठीक अगले ही दिन वे किसी वीआईपी कार के बजाय सीधे रिक्शे पर सवार होकर पटना की सड़कों पर निकल पड़े थे और आम लोगों से मिले थे.

उस दौर में इस दलित मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का यह आलम था कि युवाओं के बीच उनकी तरह बाल और दाढ़ी रखने का स्टाइल एक ट्रेंड बन गया था.

बैंक खाते में नहीं थे अंतिम संस्कार तक के पैसे

भोला बाबू की ईमानदारी का सबसे बड़ा और झकझोर देने वाला सच यह है कि जब उनका निधन हुआ, तो उनके बैंक खाते में इतने पैसे भी नहीं थे कि उनका ढंग से अंतिम संस्कार किया जा सके. आखिरकार, जिला प्रशासन को आगे आकर उनके अंतिम संस्कार का इंतजाम करना पड़ा. उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी, और उनके परिवार के लोग आज भी उनके पैतृक गांव में खेती-किसानी और मजदूरी करके ही अपना गुजारा चलाते हैं.

क्यों प्रासंगिक है उनकी कहानी?

भोला पासवान शास्त्री के बाद कर्पूरी ठाकुर जैसे कुछ गिने-चुने नाम ही ऐसे आए जिन्होंने राजनीति में शुचिता और सादगी को जिंदा रखा. आज के समय में जब राजनीति पूरी तरह धन और बाहुबल के समीकरणों में उलझ कर रह गई है, तब भोला बाबू की याद आना लाजिमी है. उनकी पूरी जिंदगी हमें यह सिखाती है कि सच्ची लोकप्रियता और सम्मान विज्ञापनों या पैसों से नहीं, बल्कि बेदाग चरित्र और सच्ची जनसेवा से ही मिलता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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