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प्रिंसिपल को चिट्ठी लिखकर रोए, नौकरी छोड़ने की बनाई योजना… फिर कैसे ‘पुस्तकालय विज्ञान के जनक’ बने रंगनाथन?

Father of Library Science: गणित के प्रोफेसर से पुस्तकालय विज्ञान के जनक बनने वाले एस.आर. रंगनाथन का सफर आसान नहीं था. जानिए कैसे इंग्लैंड की एक यात्रा ने उनका मन बदला और उन्होंने भारत में लाइब्रेरी साइंस की नींव रखी.

S R Ranganathan

Father of Library Science: साल में एक दिन ऐसा भी आता है जब हम सब पुस्तकालयों से जुड़े लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकते हैं. बारह अगस्त वही दिन है. पुस्तकालय विज्ञान के जनक शियाली रामामृत रंगनाथन के जन्मदिन को भारत में ‘लाइब्रेरियन्स डे’ के रूप में मनाया जाता है- ठीक वैसे ही जैसे २३ अप्रैल को पुस्तक दिवस मनाया जाता है.

अपने परिचितों के बीच ‘रावसाहब’ के नाम से समादृत श्री रंगनाथन के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि जिस समय वैज्ञानिक सी.वी. रमन, सत्येन्द्र नाथ बोस, धर्मशास्त्र के आचार्य पी.वी. काणे और भाषाविज्ञानी सुनीति कुमार चटर्जी को राष्ट्रीय अध्येतावृत्ति प्रदान की गई थी, उसी समय पुस्तकालय विज्ञान के क्षेत्र में शोध और अध्ययन के लिए एस.आर. रंगनाथन को भी इस सूची में सम्मिलित किया गया था. पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म-अलंकरण से विभूषित किया. उनके ही निर्देशन में दिल्ली विश्वविद्यालय में पहली बार पुस्तकालय-विज्ञान के बी.लिब. और एम.लिब. के विधिवत पाठ्यक्रम शुरू हुए. यह साल १९४७ से १९५० के बीच की बात है.

जन्म, प्रारंभिक जीवन और करियर की शुरुआत

एस.आर. रंगनाथन का जीवन बड़ा उतार-चढ़ाव भरा रहा. उनकी जीवन-यात्रा के एक-एक चरण को समझने के लिए आत्मकथा ‘ए लाइब्रेरियन लुक्स बैक’ को पढ़ा जा सकता है, जिसे पी.एन. कौला ने सम्पादित किया. तमिलनाडु में तंजौर के पास शियाली में साल १८९२ में जन्मे रंगनाथन मद्रास विश्वविद्यालय में गणित के अध्यापक थे. गणितज्ञ एडवर्ड बी. रोज का स्नेह उन्हें अपने अध्ययन काल में मिला था. मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज में गणित के अध्यापक के रूप में सेवाएं दे रहे थे कि साल १९२४ में उन्हें विश्वविद्यालय के लाइब्रेरियन की जिम्मेदारी सौंपी गई.

लाइब्रेरियन पद से शुरुआती निराशा और डंकन का आश्वासन

लाइब्रेरी में पहुंचने पर उन्हें बहुत अकेलापन महसूस हुआ. वे लौटकर प्रेसीडेंसी कॉलेज के प्रिंसिपल मिस्टर डंकन को अपनी मनःस्थिति से अवगत कराया. रंगनाथन ने अपने पत्र में लिखा- ‘I have come with a specific request. I cannot bear the solitary imprisonment day after day. No human being except the staff. How different from the life of the college.’ प्रिंसिपल डंकन ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे इंग्लैंड से पुस्तकालय संबंधी अपना प्रशिक्षण पूरा करके लौट आएँ. उसके बाद भी अगर उन्हें ठीक नहीं लगता तो उन्हें वापस गणित पढ़ाने के लिए बुला लिया जाएगा.

इंग्लैंड यात्रा और पुस्तकालय विज्ञान में रुचि का उदय

नौ महीने इंग्लैंड में बिताने के बाद १९२५ की बरसात में जब रंगनाथन स्वदेश वापस लौटे, तब तक उनका मन पुस्तकालयों और पुस्तकालय-विज्ञान में रम चुका था. इंग्लैंड में क्रोयडन पब्लिक लाइब्रेरी के प्रमुख डब्ल्यू.सी. बरबिक सायर्स के साथ तमाम पुस्तकालयों में घूमते हुए उन्होंने देखा कि वहां सामुदायिक पठन-पाठन का अद्भुत वातावरण है. बच्चे, कामगार, महिलाएं- सबके लिए जरूरत के हिसाब से अलग-अलग वाचनालय हैं.

भारत वापसी और पुस्तकालय विज्ञान के 5 मूलभूत सिद्धांत

मद्रास लौटकर रंगनाथन समूचे प्रेसीडेंसी क्षेत्र में सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए वातावरण बनाने में जुट गए. उन्होंने पुस्तकालय विज्ञान के पांच सिद्धांत दिए- हर पाठक को उसकी मनचाही पुस्तक और हर पुस्तक को उसका पाठक मिलना चाहिए; पुस्तकालय एक जीवंत इकाई है; पाठक का समय कीमती है, इसलिए पुस्तकालय ऐसी सेवाएं दें कि पाठक का समय बचे; और पुस्तकें सदुपयोग के लिए हैं.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) में योगदान

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उप-कुलपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन रंगनाथन जी को बाद में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ले गए. यहां १९४५ से १९४७ के बीच उन्होंने गोदाम की तरह अटी हुई एक लाख किताबों को व्यवस्थित किया और पुस्तकालय विज्ञान में पीजी डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किया. १९४७ से १९५० के बीच का समय रंगनाथन के लिए अपने मन के शोध और अनुसंधान का समय था. दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति मौरिस ग्वायर के अनुरोध पर रंगनाथन बनारस से दिल्ली पहुंचे. यहां वे पुस्तकालय को सहेजने के दायित्व से मुक्त थे. उन्हीं के एक विद्यार्थी एस. दासगुप्ता यहां पुस्तकालय के अध्यक्ष हुए. जब इंडियन लाइब्रेरी एसोसिएशन का गठन हुआ, तब रंगनाथन इसके अध्यक्ष और दासगुप्ता सचिव चुने गए.

दिल्ली प्रवास, वैश्विक पहचान और ‘इंसडाक’ का गठन

दिल्ली में रंगनाथन के संपर्क भारत से बाहर कई महत्वपूर्ण लोगों से बने, जो सूचनाओं के डाकुमेन्टेशन संबंधी कार्यों के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ थे. दिल्ली में रहकर रंगनाथन को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ डाकुमेन्टेशन (एफआईडी) के महासचिव डंकर डूविस के साथ काम करने का अवसर मिला. यूनेस्को में रंगनाथन क्लासिफिकेशन रिसर्च ग्रुप के प्रमुख बने. इसी दौरान साल १९५० में रंगनाथन के मार्गदर्शन में इंसडाक (इंडियन नैशनल साइंटीफिक डाकुमेन्टेशन सेंटर) का गठन हुआ. रंगनाथन अमेरिका गए और रॉकफेलर फाउंडेशन की फेलोशिप पर किताब लिखी- ‘क्लासीफिकेशन एंड कम्युनिकेशन’. बाद में ज्यूरिख और बैंगलोर रहने के दौरान भी रंगनाथन ने खुद को पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के शोध और अध्ययन में व्यस्त रखा. बैंगलोर में उन्होंने डाकुमेन्टेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की स्थापना की.

जीवन की कमाई का दान और ‘लाइब्रेरियन्स डे’ की सार्थकता

रंगनाथन को लोग कृपणता की हद तक मितव्ययी मानते रहे. लेकिन सबका भ्रम तब दूर हुआ जब शारदा रंगनाथन कोष के माध्यम से अपने जीवन की कमाई उन्होंने पुस्तकालय विज्ञान में शोध के लिए अर्पित कर दी. बारह अगस्त को लाइब्रेरियन्स डे मनाना केवल एक औपचारिकता नहीं है. यह उन हजारों पुस्तकालय कर्मियों, शोधकर्ताओं और पाठकों के प्रति कृतज्ञता का अवसर है, जिन्होंने ज्ञान को सुलभ बनाया. एस.आर. रंगनाथन का जीवन हमें याद दिलाता है कि एक व्यक्ति का समर्पण पूरे क्षेत्र को दिशा दे सकता है. उनकी पांचों सूत्र आज भी पुस्तकालयों के संचालन का आधार बने हुए हैं. इस दिन हम न केवल उनके जन्मदिन को याद करें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने काम में उतारने का संकल्प भी लें.

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-भारत एक्सप्रेस



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