राजधानी दिल्ली के मंडी हाउस चक्र (Mandi House Circle) की हलचल के बीच एक ऐसी जगह है, जहां कदम रखते ही शोर थम जाता है और घुंघरूओं की झंकार, तबले की थाप और रंगों की महक हवा में घुलने लगती है. यह जगह है ‘त्रिवेणी कला संगम’. साल 2026 में यह प्रतिष्ठित संस्थान अपने 75 वर्ष पूरे कर चुका है.
आजादी के बाद के शुरुआती सालों में जन्मा यह संस्थान आज केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत गवाह है. त्रिवेणी का अर्थ है तीन नदियों का मिलन, और यहां यह मिलन है-नृत्य, संगीत और चित्रकला का.
एक जिद और ₹10,000 से शुरू हुआ सपना
त्रिवेणी की कहानी शुरू होती है साल 1950 में, जब मशहूर भरतनाट्यम नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरानी ने दिल्ली के कनॉट प्लेस के दो कमरों से एक कला केंद्र की शुरुआत की. सुंदरी जी ने अल्मोड़ा में महान उदय शंकर के सानिध्य में प्रशिक्षण लिया था और उनका सपना था भारत का सबसे सुंदर कला केंद्र बनाना.
उनके बेटे और त्रिवेणी के महासचिव अमर श्रीधरानी बताते हैं, “मेरी मां बहुत जिद्दी थीं. उन्होंने हार मानना नहीं सीखा था.” 1950 के दशक में दिल्ली के तत्कालीन मुख्य आयुक्त शंकर प्रसाद उनसे मिलने आए और कहा कि सुंदरी जैसी महिला को कला संस्थान बनाने के लिए सरकारी जमीन मिलनी चाहिए. सुंदरी जी ने इस बात को पकड़ लिया और तब तक पीछे नहीं हटीं जब तक उन्हें मंडी हाउस में जमीन का यह टुकड़ा नहीं मिल गया.
आर्किटेक्चर का चमत्कार: जहां दीवारें भी सांस लेती हैं
जब जमीन मिल गई, तो सुंदरी जी दिग्गज वास्तुकार (Architect) जोसेफ एलन स्टीन के पास पहुंचीं. उनके पास देने के लिए सिर्फ ₹10,000 थे और एक अनोखी शर्त- “इमारत ऐसी हो कि सूरज की रोशनी छनकर अंदर आए.”
जोसेफ एलन स्टीन ने एक ऐसी ‘पोरस’ (पारगम्य) इमारत बनाई जहां धूप, हवा और विचार एक कमरे से दूसरे कमरे में बिना रोक-टोक बहते हैं. यहां की जालियां, खुले गलियारे, हरे-भरे आंगन और सादगी भरा ‘नेचुरल फिनिश’ इसे दिल्ली की अन्य इमारतों से अलग बनाता है. स्टीन ने इसे एक ‘U’ आकार में डिजाइन किया, जिससे यह छात्रों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी हमेशा खुला महसूस होता है.
मशहूर हस्तियों का ‘दूसरा घर’
त्रिवेणी की सीढ़ियों और गलियारों ने भारतीय कला जगत के सबसे बड़े सितारों को बनते देखा है. चाहे वह पेंटिंग की दुनिया के दिग्गज एम.एफ. हुसैन, तैयब मेहता और कृष्ण खन्ना हों, या शास्त्रीय नृत्य की रानी यामिनी कृष्णमूर्ति. यहां के ऑडिटोरियम में पंडित रविशंकर का सितार गूंजा है और हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी ने समां बांधा है.
अभिनय की दुनिया की बात करें तो नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी और रोहिणी हट्टंगड़ी जैसे दिग्गजों ने यहां घंटों अभ्यास किया है. यहां तक कि ‘ड्रीम गर्ल’ हेमा मालिनी ने भरतनाट्यम की अपनी शुरुआती शिक्षा इसी संस्थान में रामस्वामी पिल्लई से प्राप्त की थी.
मनोज बाजपेयी और छऊ नृत्य का गहरा नाता
त्रिवेणी की कलात्मकता केवल शास्त्रीय नृत्य तक सीमित नहीं रही. यहां के छऊ (Chhau) नृत्य विभाग का अपना एक विशेष महत्व है. छऊ शिक्षक सपन आचार्य बताते हैं कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के छात्र अक्सर चेहरे के हाव-भाव और शरीर की फुर्ती सीखने यहां आते हैं. बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता मनोज बाजपेयी ने सपन के पिता लिंगराज आचार्य के सानिध्य में पूरे चार साल तक यहां छऊ नृत्य सीखा, जिसने उनके अभिनय कौशल को निखारने में बड़ी भूमिका निभाई.
सिर्फ सितारों के लिए नहीं, आम जन के लिए भी
त्रिवेणी की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यह कभी भी केवल ‘एलीट’ या खास लोगों के लिए नहीं रहा. यह उस एक्टिविस्ट का भी ठिकाना है जो नुक्कड़ नाटक रिहर्सल करना चाहता है, उस दोस्त का भी जो ‘त्रिवेणी टेरेस कैफे’ में कॉफी और सैंडविच का लुत्फ लेना चाहता है, और उस कला प्रेमी का भी जो बिना किसी टिकट के बस गैलरी में घूमना चाहता है.
मशहूर कलाकार रामेश्वर ब्रूटा, जो 1967 से यहां के कला विभाग के प्रमुख हैं, याद करते हैं कि वे पहली बार 1963 में एक दोस्त के साथ सिर्फ चाय पीने यहां आए थे. यहां की सादगी और खुलेपन ने उन्हें ऐसा मोह लिया कि उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की- ‘काश पास होने के बाद मुझे यहीं नौकरी मिल जाए.’ आज उनके जुड़ाव को 60 साल होने को हैं.
सुंदरी श्रीधरानी के वे ‘कड़े नियम’
- साल 2012 में सुंदरी श्रीधरानी का निधन हो गया, लेकिन जाने से पहले उन्होंने अपने बेटे अमर को कुछ कड़े निर्देश दिए थे, जिनका पालन आज भी किया जाता है:
- कोई सरकारी मदद नहीं: त्रिवेणी न तो सरकारी फंड लेती है और न ही डोनेशन. यह आत्मनिर्भर है.
- सस्ता किराया: आर्ट गैलरी का किराया इतना कम रखा जाता है कि एक नया और गरीब कलाकार भी अपनी प्रदर्शनी लगा सके.
- नो टिकट पॉलिसी: त्रिवेणी के दो ऑडिटोरियम में होने वाले किसी भी कार्यक्रम के लिए टिकट नहीं बेचा जा सकता. कला यहां सबके लिए मुफ्त और सुलभ होनी चाहिए.
कला का संगम: एक अटूट सिलसिला
आज 75 साल बाद भी त्रिवेणी में वही ऊर्जा है. दोपहर की धूप जब इसकी दीवारों पर पड़ती है, तो बेसमेंट की ‘आर्ट हेरिटेज गैलरी’ से लेकर ऊपर की कक्षाओं तक एक अलग ही दुनिया जीवंत हो उठती है. यहां भरतनाट्यम, कत्थक, बांसुरी, तबला, ढोलक और सितार की कक्षाएं साथ-साथ चलती हैं.
वास्तुकार सुधीश मोहिंद्रू कहते हैं, “त्रिवेणी का दर्शन ही कला को सुलभ बनाना है. जब आप बगीचे में बैठते हैं, तो आपको एक साथ घुंघरू की आवाज और तबले की थाप सुनाई देती है. यह ‘क्रॉस-फर्टिलाइजेशन’ है, जहां एक विधा दूसरी विधा को प्रेरित करती है.”
75 वर्षों का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि अगर इरादे सुंदरी श्रीधरानी जैसे पक्के हों, तो दो कमरों से शुरू हुआ सपना एक पूरे देश की सांस्कृतिक पहचान बन सकता है. त्रिवेणी कला संगम आज भी दिल्ली की धूप में चमक रहा है-आने वाली पीढ़ियों को यह बताने के लिए कि कला का असली आनंद उसके खुलेपन में ही है.
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