Bharat Express DD Free Dish

रेत और विमुक्ति दिवस: वे जनजातियां जिन्हें 31 अगस्त को मिला दूसरा स्वतंत्रता दिवस

31 अगस्त को विमुक्ति दिवस उन घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों की मुक्ति की याद में मनाया जाता है, जिन्हें ब्रिटिश शासन ने ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित किया था.

विमुक्ति दिवस
Edited by Rohit Agrawal

भारत में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है. लेकिन देश के करोड़ों लोगों के लिए एक और स्वतंत्रता दिवस भी है-31 अगस्त. बता दें इस दिन को ‘विमुक्ति दिवस’ या ‘विमुक्त जाति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. यह दिन उन जनजातियों की कहानी है जिन्हें अंग्रेजों ने कानूनी तौर पर ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था और जिन्हें आजादी के पांच साल बाद असली मुक्ति मिली.

अंग्रेजों का क्रूर कानून

1871 में ब्रिटिश शासन ने ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ (Criminal Tribes Act) लागू किया. इस कानून के तहत कई घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों को जन्म से ही अपराधी मान लिया गया. इनके सदस्यों को पुलिस थानों में हाजिरी देनी पड़ती थी, उनकी आवाजाही पर पाबंदी थी और उन्हें विशेष बस्तियों में बंद रखा जाता था. इस अधिनियम का एक बड़ा कारण 1857 का विद्रोह भी माना जाता है. उस विद्रोह में कई जनजातियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था.

ज्ञात रहे अंग्रेज इन यायावर समुदायों को नियंत्रित करने में असमर्थ थे क्योंकि इनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था. इसलिए उन्हें सूचीबद्ध कर ‘अपराधी जनजाति’ घोषित कर दिया गया. समय के साथ संशोधनों के जरिए लगभग 190-192 जनजातियों को इस कानून के दायरे में लाया गया. लगभग 80 साल तक देश की कानूनी व्यवस्था ने इन समुदायों को जन्मजात अपराधी माना.

31 अगस्त 1952: असली मुक्ति का दिन

आजादी के बाद भी यह कानून कुछ समय तक लागू रहा. अंततः 31 अगस्त 1952 को ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ को पूरी तरह रद्द कर दिया गया. आपराधिक जनजाति कानून (निरसन) अधिनियम, 1952 के तहत इन जनजातियों को ‘विमुक्त’ (Denotified) घोषित किया गया. देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में यह ऐतिहासिक कदम उठाया गया. इसी दिन से इन समुदायों ने 31 अगस्त को ‘विमुक्ति दिवस’ के रूप में मनाना शुरू कर दिया. कई लोग इसे अपना ‘दूसरा स्वतंत्रता दिवस’ कहते हैं.

आज भी महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में इस दिन को सरकारी स्तर पर मनाया जाता है. इन समुदायों को अब विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां (DNT/NT/SNT) कहा जाता है.

‘रेत’ उपन्यास: कंजर समुदाय की कथा

भगवानदास मोरवाल का उपन्यास ‘रेत’ इन्हीं विमुक्त जनजातियों की बर्बर और लोमहर्षक दास्तान है. यह उपन्यास कंजर समुदाय (काननचर—जंगल में घूमने वाले) के सामाजिक ताने-बाने, संस्कृति, लोक-विश्वासों और संघर्षों को जीवंत करता है. ‘रेत’ में कमला सदन नाम के घर के इर्द-गिर्द कहानी घूमती है, जहां मातृसत्तात्मक व्यवस्था, खेलावड़ी परंपरा और समाज की दोहरी नैतिकता आमने-सामने हैं.

लेखक ने राजस्थान-हरियाणा सीमा क्षेत्र में बसे कंजर समुदाय के जीवन को बहुत बारीकी से चित्रित किया है-उनकी आस्था, रीति-रिवाज, स्त्रियों की स्थिति और उस कलंक का बोझ जो अंग्रेजी कानून ने उन पर लाद दिया था. यह उपन्यास सिर्फ एक समुदाय की कथा नहीं है. यह उस ऐतिहासिक अन्याय का साहित्यिक दस्तावेज है, जो सदियों तक इन लोगों को हाशिये पर धकेले रहा.

यह भी पढ़ें: ‘कोई इतनी आसानी से अपमान नहीं कर सकता’, अखिलेश पर भड़के जयंत चौधरी, PDA पर भी उठाए सवाल

आज भी अधूरी मुक्ति

कानूनी रूप से विमुक्त होने के बावजूद इन समुदायों पर सामाजिक कलंक आज भी बरकरार है. कई जगहों पर अभी भी उन्हें संदेह की नजर से देखा जाता है. शिक्षा, रोजगार, आवास और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष जारी है. 31 अगस्त का दिन हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता सिर्फ एक तारीख नहीं होती.

कुछ समुदायों के लिए वह संघर्ष आज भी जारी है. ‘रेत’ जैसी रचनाएं इन अनसुनी आवाजों को साहित्य के माध्यम से मुख्यधारा तक पहुँचाती हैं. विमुक्ति दिवस सिर्फ स्मृति का दिन नहीं, बल्कि आत्म-मंथन का भी दिन होना चाहिए-कि क्या हमने वाकई इन समुदायों को पूरी तरह मुक्त किया है?

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read