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‘राजशाही’ से ‘लड़खड़ाते लोकतंत्र’ तक: 200 साल में बार-बार नेपाल ने क्यों देखी क्रांति? EXPLAINER

History of Nepal: अपने उबड़-खाबड़ इतिहास के साथ एक बार फिर से नेपाल के भविष्य पर सवाल खड़ा हो गया है. आइये जानें 18वीं सदी से लेकर 2015 तक नेपाल ने क्या दौर देखा है. कैसे यहां राजशाही फिर लोकतांत्रिक राजशाही और उसके बाद लड़खड़ाता हुआ लोकतंत्र आया?

Monarchy to Democracy Revolution 200 Years History Of Nepal Instability

नेपाल का इतिहास

History of Nepal: कहते हैं ‘पहाड़ों का सीना जितना सख्त, उसका दिल उतना नरम’ होता है. हालांकि, पहाड़ों की संरचना बेहद उबड़-खाबड़ होती है. ठीक इसी तरह हिमालय में बसे नेपाल का इतिहास है. ‘एक नवाब का घर वीरान हुआ तो एक फकीर के घर चिराग जला’ यह बात इन दिनों नेपाल पर एकदम सटीक बैठती है. एक ऐसा देश जो सैकड़ों साल की राजशाही, क्रूरता और विद्रोह को झेलकर भी अभी तक खुद को गढ़ नहीं पा रहा है. सोशल मीडिया पर लगे बैन के कारण युवाओं ने आंदोलन किया और केपी शर्मा ओली की सरकार गिर गई. अब देश में नई सरकार और व्यवस्था की बात चल पड़ी है. हालांकि, ऐसा कोई पहली बार नहीं है नेपाल के उदय से उसका इतिहास कुछ ऐसे ही उबड़-खाबड़ रहा है.

18वीं सदी से शुरू होता है सफर

नेपाल का सफर 18वीं सदी के गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह से शुरू होता है. उस समय नेपाल छोटे-छोटे रियासतों में बंटा हुआ था. पृथ्वी नारायण शाह ने इन टुकड़ों को जोड़कर एक राष्ट्र की नींव रखी. इतिहासकार लुडविग स्टिलर अपनी किताब ‘द राइज ऑफ द हाउस ऑफ गोरखा’ में लिखते हैं कि शाह का सपना सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि एक मजबूत मुल्क बनाना था, ताकि वह विदेशी ताकतों से सुरक्षित रह सके. लेकिन इस नींव के साथ ही सत्ता का केंद्र राजा बन गया, और जनता केवल प्रजा बनकर रह गई.

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लंबे समय तक शाह वंश ने शासन किया लेकिन 1846 में हुए कोत कांड ने इतिहास का रुख मोड़ दिया. 14 सितंबर 1846 को तत्कालीन काजी जंग बहादुर कुवर और उनके भाइयों ने नेपाल के महल में हनला बोल दिया. वहां मौजूद करीब 30-40 प्रमुख सैन्य, नागरिक, अधिकारियों समेत प्रधान मंत्री चौतरिया फतेह जंग शाह की हत्या कर दी गई. इसी के साथ नेपाल में राणा वंश का दौर शुरू हो गया. 104 साल तक चली राणाओं की तानाशाही ने नेपाल को पीछे धकेल दिया. भले देश में राजा था लेकिन सत्ता राणा के प्रधानमंत्री के पास होती थी.

  • 18वीं सदी में गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल की नींव रखी.
  • 14 सितंबर 1846 के कोत कांड के बाद शाह के बाद राणा वंश का दौर आया.
  • करीब 104 साल राणा वंश ने नेपाल पर तानाशाही चलाई.

20वीं सदी में जागी जनता

राणा वंश की सत्ता में दौरान स्कूल, कॉलेज और प्रेस तक पर पाबंदी थी. जनता की स्थिति किसी बंद कमरे की हवा की तरह थी. 20वीं सदी के मध्य में जब भारत में आजादी की लहर उठी तो उसकी हवा नेपाल तक भी पहुंची. यहां भी बदलाव की चिंगारी सुलगने लगी थी. नेपाली कांग्रेस, प्रजा परिषद जैसे कई संगठनों ने राणा शासन के खिलाफ आवाज उठाई.

जॉन व्हेल्प्टन अपनी किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ नेपाल’ में लिखते हैं कि यह आंदोलन नेपाल के लोगों में यह एहसास जगाने वाला पहला कदम था कि सत्ता सिर्फ राजा या राणा की नहीं, जनता की भी हो सकती है. यही कारण था कि राजा त्रिभुवन ने भी राणाओं के खिलाफ इस बगावत में जनता का साथ दिया. 1951 में राणा शासन ढह गया और नेपाल ने पहली बार लोकतंत्र का स्वाद चखा. यह एक नवजात लोकतंत्र था, लेकिन इसने जनता को पहली बार अपनी आवाज की ताकत का एहसास कराया.

नेपाल का नया दौर

इतिहासकार ऋषिकेश शाह अपनी किताब ‘मॉडर्न नेपाल: ए पॉलिटिकल हिस्ट्री’ में लिखते हैं कि राणाओं ने नेपाल को ठहरा दिया था. लेकिन, कहते हैं न अंधेरे के बाद सवेरा जरूर आता है. 1950 में राजा त्रिभुवन ने भारत की मदद से राणा शासन को खत्म कर दिया. यह पहली बार था जब नेपाल ने लोकतंत्र की हवा में सांस ली. 1951 में राणा शासन का खात्मा हुआ और नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र की शुरुआत हुई. 1959 में देश में पहले आम चुनाव हुए और बीपी कोइराला पहले चुने हुए प्रधानमंत्री बने. हालांकि, लोकतंत्र का यह सफर ज्यादा दिन नहीं चला.

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1960 में राजा महेंद्र ने अचानक संसद को भंग कर दिया और पंचायत प्रणाली’ लागू कर दी. इस व्यवस्था में राजा ही सर्वोच्च था और जनता की कोई सुनवाई नहीं थी. सीके लाल अपनी किताब ‘टू बी ए नेपाली’ में बताते हैं कि नेपाल के लिए एक तन्हा रास्ता था, जहां जनता की आवाज फिर से दबा दी गई. अगले तीन दशकों तक नेपाल इसी अंधेरे में रहा. लेकिन, जनता का जोश ठंडा नहीं पड़ा. 1990 में एक और जनआंदोलन उभरा जिसने देश को नई दिशा दी.

  • 20वीं सदी के मध्य में भारत में आजादी की लहर नेपाल तक पहुंची
  • 1950-51 में राजा त्रिभुवन के सहयोग से राणा शासन का अंत हुआ और नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र का उदय हुआ.
  • 1959 में पहले आम चुनाव हुए और बीपी कोइराला पहले प्रधानमंत्री बने.
  • 1960 में राजा महेंद्र ने संसद भंग कर पंचायत व्यवस्था लागू की.

1990 का दशक नेपाल के लिए एक नया सवेरा लेकर आया. राणा और पंचायत शासन से तंग आ चुकी जनता मुखर होकर सड़कों पर उतर आई. इस जनआंदोलन में छात्र, मजदूर और राजनीतिक दल सब एक साथ थे. लोकतंत्र की मांग को लेकर सब सड़कों पर आ गए. आखिरकार राजा बीरेन्द्र को जनता के सामने झुकना पड़ा. राजा बीरेंद्र ने संविधान में बदलाव किए और देश में बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना हुई. तत्कालीन प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टराई ने इसे जनता की जीत बताया था.

  • 1990 का दशक में जनआंदोलन-1 के जरिए जनता ने लोकतंत्र की मांग की.
  • 1990 में राजा बीरेंद्र को झुकना पड़ा और बहुदलीय लोकतंत्र बहाल हुआ.

21वीं सदी में नरसंहार और लोकतंत्र की शुरुआत

लोकतंत्र की यह रास्ता सीधा नहीं था. भ्रष्टाचार, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक असमानता ने जल्द ही एक नए तूफान को जन्म दिया. इन समस्याओं का फायदा उठाते हुए 1996 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया. उन्होंने ग्रामीण इलाकों में अपनी गहरी पैठ बना ली और समानांतर सरकार चलाने लगे. इसने देश में हिंसा और अस्थिरता दौर शुरू कर दिया. इसी बीच, 2001 में एक भयानक घटना घटी जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया. शाही परिवार का नरसंहार हो गया, जिसमें राजा बीरेंद्र और उनके परिवार के कई सदस्य मारे गए.

  • 1996 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने सशस्त्र विद्रोह शुरू किया.
  • 2001 में शाही परिवार का नरसंहार हुआ.

राजा बीरेंद्र की मौत के बाद भाई राजा ज्ञानेंद्र ने सत्ता संभाली और 2005 में उन्होंने पूरी तरह से सत्ता अपने हाथ में ले ली. लोकतंत्र को दबाने के लिए उठाया गया यह कदम राजा के लिए आखिरी दांव साबित हुआ. हुआ यूं की 2006 में एक और बड़ा जनआंदोलन शुरू हुआ. इस बार लाखों लोग सड़कों पर उतरे. राजनीतिक दल, माओवादी, और आम जनता ने मिलकर ‘राजा हटाओ, लोकतंत्र लाओ’ का नारा बुलंद किया. इस भारी दबाव के आगे राजा ज्ञानेंद्र को झुकना पड़ा.

  • 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने सत्ता पूरी तरह अपने हाथ में ली.
  • 2006 में जनआंदोलन-2 के कारण राजा ज्ञानेंद्र को झुकना पड़ा.

2008-15 में बना आधुनिक नेपाल

आखिरकार 2008 में संविधान सभा ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया जिसमें देश को राजशाही से आजाद कर दिया गया और नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना दिया गया. अंतिम राजा ज्ञानेंद्र सिंह को महल छोड़ना पड़ा. इतिहासकार सीके लाल ने इसे जनता का दूसरा जन्म कहा था. 2008 में गणराज्य बनने के 2015 में एक नया संविधान लागू किया गया जिसने देश को सात प्रांतों में विभाजित किया. लेकिन, राजनीतिक अस्थिरता, गठबंधन सरकारें और 2015 के विनाशकारी भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं देश के सामने बड़ी चुनौतियां बनी रहीं.

  • 2008 में संविधान सभा ने नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया.
  • 2015 में नया संविधान लागू हुआ और विनाशकारी भूकंप आया.

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अभी भी सपना अधूरा

2008 में राजशाही के खात्मे के बाद से ही नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही. साल 2015 में नेपाल लोकतांत्रिक गणराज्य बना. तब से लेकर अब तक देश ने लगातार कई प्रधानमंत्री देखे, जो अक्सर गठबंधन सरकारों के कमजोर होने के कारण सत्ता से बाहर हुए और फिर सरकार बनाए. कम्युनिस्ट और कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने सरकारें बनाईं लेकिन अब तक कोई भी सरकार लंबी नहीं चल सकी. एक बार फिर से जेनजी आंदोलन ने केपी शर्मा ओली की सरकार गिरा दी है. अभी भी नेपाल के भविष्य पर सवाल खड़ा हुआ है. इस तरह से 200 साल के इतिहास में नेपाल की मजबूत सरकार का सपना अभी भी अधूरा है.



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