PAK Afghanistan Conflict: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव अब धीरे-धीरे युद्ध की तरफ बढ़ता दिख रहा है. दोनों देश एक-दूसरे पर हमलों की खबरें दे रहे हैं, लेकिन किसी भी मुद्दे का समाधान युद्ध से नहीं निकलता है. युद्ध से सिर्फ जनहानि नहीं होती, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ता है. खासकर उन देशों के लिए, जो पहले ही आर्थिक मुश्किलों में हैं. पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ही आर्थिक तौर पर नाजुक स्थिति में हैं.
दोनों देशों की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के पीछे सिर्फ सीमाई तनाव ही नहीं, बल्कि गहरे आर्थिक हित भी हैं. पाकिस्तान कर्ज और महंगाई के दबाव में है, वहीं अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और सीमित मान्यता के कारण निवेश की कमी का सामना कर रहा है. इसी बीच सीमा विवाद व्यापार, रोजगार और राजस्व पर सीधा असर डालता है.
पाकिस्तान के लिए अफगानिस्तान मध्य एशिया तक पहुंच का प्रवेश द्वार है. कराची और ग्वादर पोर्ट के जरिए अफगानिस्तान समुद्री व्यापार करता है, और पाकिस्तान को ट्रांजिट फीस, कस्टम ड्यूटी और लॉजिस्टिक्स से राजस्व मिलता है. लेकिन जब सीमा बंद होती है, तो खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के सीमावर्ती इलाकों की आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ जाती हैं. इसके अलावा सुरक्षा बढ़ने से रक्षा खर्च भी बढ़ता है, जो पहले से दबाव में चल रही अर्थव्यवस्था के लिए बुरा संकेत है.
अफगानिस्तान भौगोलिक रूप से लैंडलॉक देश है और समुद्री मार्ग के लिए पाकिस्तान के बंदरगाहों पर निर्भर है. सीमा बंद होने या तनाव बढ़ने पर यहां आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं.
खनिज संपदा और निवेश की संभावनाएं
अफगानिस्तान में तांबा, लिथियम और अन्य खनिजों की भरमार है. अगर क्षेत्र स्थिर हो, तो विदेशी निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं जैसे TAPI गैस पाइपलाइन गति पकड़ सकती हैं. ये दोनों देशों के लिए ऊर्जा और ट्रांजिट आय का जरिया बन सकती हैं. लेकिन अस्थिरता इन योजनाओं को धीमा कर देती है.
भारत पर क्या होगा असर?
अगर इन दोनों देशों में सैन्य संघर्ष होता हैं, तो भारत पर भी असर दिखेगा. अफगानिस्तान में अस्थिरता का मतलब है चरमपंथी ताकतों का फिर से सिर उठाना, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकता है. हालांकि, रणनीतिक रूप से पाकिस्तान का दो मोर्चों (पूर्वी और पश्चिमी सीमा) पर उलझना भारत के लिए कुछ हद तक राहत की बात हो सकती है, लेकिन आर्थिक तौर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और मध्य एशिया से कनेक्टिविटी के सपनों को झटका लग सकता है.
चीन के लिए खतरा या अवसर?
इस पूरे ड्रामे में चीन की नजरें सबसे ज्यादा चौकन्नी हैं. चीन ने पाकिस्तान में CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के जरिए भारी निवेश किया है. युद्ध का मतलब है उसके निवेश पर खतरा. हालांकि, पाकिस्तान की और बिगड़ती हालत चीन को वहां अपना दबदबा बढ़ाने का मौका भी दे सकती है. वहीं ईरान, चाबहार बंदरगाह के जरिए खुद को अफगानिस्तान के लिए एक बेहतर विकल्प के रूप में पेश करने की फिराक में है.
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-भारत एक्सप्रेस
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