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अमेरिका में नौकरी करने का सपना देखने वाले भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और टेक कंपनियों के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है. अमेरिकी संघीय अदालत (Federal Court) ने ट्रंप प्रशासन के उस विवादित फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत H-1B वीजा के लिए 1 लाख डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) की भारी-भरकम अतिरिक्त फीस लगाने का नियम बनाया गया था. कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा कि देश के राष्ट्रपति को संसद (कांग्रेस) की मंजूरी के बिना अपनी मर्जी से नया टैक्स थोपने का कोई अधिकार नहीं है.
जबरन लगाया गया ‘अवैध टैक्स’
अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो टी. सोरोकिन ने 42 पन्नों के अपने कड़े फैसले में स्पष्ट किया कि ये मामला इमिग्रेशन नीति का नहीं, बल्कि संवैधानिक सीमाओं का है. ट्रंप सरकार का तर्क था कि राष्ट्रपति के पास विदेशी नागरिकों की एंट्री पर प्रतिबंध या शर्तें लगाने की शक्ति है और ये फीस उसी का हिस्सा है.
लेकिन जज सोरोकिन ने सरकार की इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा, ‘टैक्स को पाबंदी का नाम नहीं दिया जा सकता.’ उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि अमेरिकी संविधान के मुताबिक टैक्स लगाने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है. इमिग्रेशन कानून राष्ट्रपति को नियम बनाने की छूट तो देते हैं, लेकिन वे बिना संसदीय मंजूरी के कंपनियों या विदेशी नागरिकों पर इतना बड़ा आर्थिक बोझ नहीं डाल सकते.
नियमों की अनदेखी कर कंपनियों पर डाला बोझ
अदालत ने ये भी पाया कि इस नीति को लागू करने वाली सरकारी एजेंसियों ने तय नियम-कानूनों और प्रक्रियाओं को पूरी तरह ताक पर रख दिया था. सरकार ये समझाने में भी नाकाम रही कि आखिर अमेरिकी नियोक्ताओं (Companies) पर अचानक इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत क्यों डाली जा रही है.
कोर्ट ने इस पूरी नीति को अवैध और राष्ट्रपति की शक्तियों से बाहर घोषित करते हुए इसे पूरे अमेरिका में तुरंत प्रभाव से रद्द करने का आदेश दिया है. इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब भारतीय टेक दिग्गजों और इंजीनियरों को करोड़ों रुपये की इस एक्स्ट्रा मार से बड़ी राहत मिल गई है.
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-भारत एक्सप्रेस
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