Europe-India Temperature: इन दिनों यूरोप में पड़ रही भीषण गर्मी ने एक चौंकाने वाली स्थिति पैदा कर दी है. कई देशों में तापमान 40 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है लेकिन असर इतना ज्यादा है कि सड़कें पिघल रही हैं, रेल की पटरियां टेढ़ी हो रही हैं. यहां तक की चलती गाड़ियों के टायर भी पिघल रहे हैं और ट्रैफिक सिग्नल भी पिघल रहे हैं. अस्पताल मरीजों से भरते जा रहे हैं और कई जगह इमरजेंसी अलर्ट जारी करना पड़ा है.
दिलचस्प बात यह है कि भारत में इससे भी ज्यादा तापमान आमतौर पर दर्ज होता है लेकिन फिर भी सवाल उठता है कि आखिर एक ही तापमान यूरोप और भारत में इतना अलग क्यों महसूस होता है?
सोशल मीडिया पर भी यही बहस तेज है कि यूरोप की गर्मी भारत की तुलना में ज्यादा असहनीय क्यों लगती है. असल में सिर्फ थर्मामीटर का नंबर यह तय नहीं करता कि गर्मी कितनी तेज महसूस होगी. इसके पीछे कई पर्यावरणीय और जीवनशैली से जुड़े कारण होते हैं, जिनके बारे में आज हम आपको इस खबर में बताने वाले हैं.
नमी और हवा का सबसे बड़ा रोल
विशेषज्ञों के मुताबिक गर्मी का असली असर नमी पर काफी निर्भर करता है. जब हवा में नमी ज्यादा होती है तो शरीर का पसीना आसानी से सूख नहीं पाता. इससे शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता और गर्मी ज्यादा भारी महसूस होती है.
यूरोप के कई हिस्सों में अचानक आने वाली हीटवेव के दौरान नमी और बंद वातावरण हालात को और मुश्किल बना देते हैं. वहीं भारत के कई इलाकों में लोग लंबे समय से गर्म जलवायु के अभ्यस्त हैं, जिससे शरीर कुछ हद तक अनुकूल हो चुका होता है.
शहरों की बनावट भी बढ़ाती है फर्क
यूरोप और भारत की गर्मी के अनुभव में बड़ा अंतर उनके घरों और शहरों की संरचना का भी है. यूरोप के कई घर सर्दियों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं, जहां मोटी दीवारें और कम वेंटिलेशन होता है ताकि ठंड के दौरान गर्मी अंदर बनी रहे. लेकिन यही डिजाइन गर्मियों में अंदर की गर्मी को बाहर निकलने नहीं देता.
इसके उलट भारत के कई हिस्सों में खुले डिजाइन, बेहतर हवा का प्रवाह और पारंपरिक तरीके गर्मी से निपटने में मदद करते हैं. हालांकि तेजी से बढ़ता शहरीकरण और कंक्रीट के जंगल अब भारत में भी गर्मी का असर बढ़ा रहे हैं. आने वाले समय में यहां भी यूरोप जैसी परिस्थितियां देखने को मिल सकती हैं.
आदतों और कूलिंग सिस्टम का असर
एक बड़ा फर्क एयर कंडीशनिंग और जीवनशैली का भी है. भारत में कूलिंग सिस्टम और एयर कंडीशनर अपेक्षाकृत ज्यादा आम हैं, जबकि यूरोप के कई देशों में यह सुविधा सीमित है. अचानक बढ़ी गर्मी में लोग इसके लिए तैयार नहीं होते जिससे असुविधा ज्यादा महसूस होती है.
इसके अलावा शरीर भी धीरे-धीरे अपने वातावरण के अनुसार ढल जाता है. जो लोग लंबे समय से गर्म जलवायु में रहते हैं उनकी सहनशक्ति अलग होती है, जबकि ठंडे देशों के लोग अचानक गर्मी को ज्यादा तीव्र महसूस करते हैं.
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पूरा माहौल तय करता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि 43°C तापमान हर जगह चुनौतीपूर्ण होता है लेकिन उसका असली असर हवा, नमी, धूप, शहरों की घनता और जीवनशैली पर निर्भर करता है. घनी इमारतें, कम हवा का प्रवाह और लगातार गर्मी शरीर पर दबाव बढ़ा देते हैं. यही वजह है कि एक ही तापमान कहीं सामान्य लग सकता है और कहीं बेहद खतरनाक महसूस हो सकता है.
यूरोप में हालात क्यों गंभीर हुए?
यूरोप जिसे आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और मजबूत शहरी व्यवस्था के लिए जाना जाता है, इस बार भीषण गर्मी के सामने कमजोर पड़ता दिख रहा है. कई जगह सड़कें पिघलने और टूटने लगी हैं, रेल ट्रैक मुड़ रहे हैं और रोड़ पर लगी सिगनल लाइट पर असर पड़ रहा है.
जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों में हालात ज्यादा गंभीर हैं. बर्लिन के पास हाईवे पर कंक्रीट फटने से ट्रैफिक रोकना पड़ा. फ्रांस में बिजली उत्पादन घटाना पड़ा क्योंकि कूलिंग सिस्टम पर दबाव बढ़ गया. अस्पतालों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं. कई देशों में रेड हीट अलर्ट जारी किया गया है और लोगों को घरों में रहने की सलाह दी जा रही है. यही वजह है कि एक ही 43°C तापमान कहीं सामान्य लगता है और कहीं खतरनाक हो जाता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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