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सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त उपहारों की प्रथा पर नाराजगी जताई, बेघर लोगों के लिए आश्रय की मांग की

सुप्रीम कोर्ट ने शहरी बेघर लोगों के लिए आश्रय सुनिश्चित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान मुफ्त उपहारों की प्रथा पर नाराजगी जताई. कोर्ट ने कहा कि मुफ्त राशन और धनराशि के कारण लोग काम करने की इच्छा खो रहे हैं और इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है.

Supreme Court
Aarika Singh Edited by Aarika Singh

सुप्रीम कोर्ट ने बेघर लोगों के लिए आश्रय सुनिश्चित करने के लिए तंत्र की मांग करने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों से पहले मुफ्त उपहारों की की घोषणा करने की प्रथा पर एक बार फिर नाराजगी जाहिर की है. कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि लोग अब काम करने के इच्छुक नहीं है, क्योंकि उन्हें मुफ्त राशन और धनराशि मिल रही है.

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने शहरी क्षेत्रों में बेघर लोगों के आश्रय के अधिकार से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की है. अटॉर्नी जनरल आर वैंकटरमणि ने कोर्ट को बताया कि केंद्र शहरी गरीबी मिशन को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है, जो शहरी बेघरों के लिए आश्रय के प्रावधान सहित विभिन्न मुद्दों का समाधान करेगा. कोर्ट 6 सप्ताह बाद इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बीआर गवई ने टिप्पणी करते हुए कहा कि दुर्भाग्यवश मुफ्त की इन सुविधाओं के कारण, लोग काम करने को तैयार नही है.

ठंड से 750 लोगों की मौत

उन्हें मुफ्त राशन मिल रहा है. उन्हें बिना कोई काम किए ही धनराशि मिल रही है. कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल को केंद्र सरकार से यह पूछने का निर्देश दिया कि शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन कितने समय में लागू किया जाएगा. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने शहरी इलाकों में आश्रय स्थल की योजनाओं को फंड देना बंद कर दिया गया है. इसके चलते इन सर्दियों में ठंड से 750 लोगों की मौत हो चुकी है.

उन्होंने यह भी कहा कि यहां गरीबों की चिंता नही की जाती है, सिर्फ अमीरों की चिंता की जाती है. भूषण के इस दलील पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अदालत में राजनीतिक बयानबाजी की इजाजत नहीं दी जा सकती है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि हम उनके प्रति आपकी चिंता की सराहना करते है. मुफ्त राशन और पैसा देने की जगह क्या ये अच्छा नहीं होगा कि इन लोगों को समाज की मुख्य धारा में शामिल किया जाए और देश के विकास में इन्हें भी योगदान देने का मौका मिले.

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान भूषण से पूछा कि रहने लायक आश्रय गृह और सड़क पर सोने में से क्या बेहतर है? अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट को सुझाव दिया कि इस मामले में एमिकस क्यूरी नियुक्त किया जा सकता है और राज्यों के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है. यह कोई विरोधात्मक मामला नही है. भूषण ने कहा कि एल. डी. ए. जी का कहना है कि 4 दिसंबर तक 2557 आश्रय गृह स्वीकृत किए गए है और 1995 कार्यरत है. भूषण ने मुताबिक सिर्फ दिल्ली में तीन लाख लोग बेघर है.

-भारत एक्सप्रेस  



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