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क्यों है होली का त्योहार खास? राधा-कृष्ण के अलौकिक प्रेम का प्रतीक होली….

हर जगह होली मनाने की अपनी परंपरा है लेकिन बृज की होली का अपना ही एक अलग अंदाज है. जो हर भक्त को प्रेम और आनंद से भर देता है . होली के इस स्थान का वातावरण पूरी तरह से रंग-बिरंगे फूलों से सजा होता है जो कि लोगों के दिल में खुशियों का संचार करता है.

radha krishna Holi
Edited by Akansha

होली का पर्व देशभर में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है. रंगों की इस अनोखी परंपरा में लोग आपसी भेदभाव भूलकर एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं और खुशियां बांटते हैं. हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.

होली पर वैसे तो कई लोक कथाएं हैं और हर जगह होली मनाने की अपनी परंपरा है लेकिन बृज की होली का अपना ही एक अलग अंदाज है, वृंदावन की फूलों की होली, बरसाना की लड्डू मार होली, मथुरा की लठ्ठमार होली.

मथुरा की लट्ठमार होली 

barsana ki lathmar holi 2025

मथुरा की लट्ठमार होली सबसे खास होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापरयुग में भगवान कृष्ण ने राधा रानी और गोपियों के साथ लट्ठमार होली खेली थी। इसके बाद से ही यहां लट्ठमार होली खेलने की परंपरा शुरू हुई। कहते हैं आज भी बृज की गलियों में राधा-कृष्ण आते हैं. उनके प्रेम की झलकियां वहां देखने को मिलती है.

बरसाना की होली

बरसाना की होली सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के अमर प्रेम की जीवंत झलक है. यहां लड्डू, गुलाल और भक्ति का अनोखा संगम देखने को मिलता है, जो हर भक्त को प्रेम और आनंद से भर देता है . होली के इस स्थान का वातावरण पूरी तरह से रंग-बिरंगे फूलों से सजा होता है जो कि लोगों के दिल में खुशियों का संचार करता है.

बांके बिहारी मंदिर की फूलों की होली

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में मुख्य होली से पहले फूलों की होली खेली जाती है. इस दिन भक्तों का जमावड़ा लगता है और मंदिर परिसर में फूल बरसाए जाते हैं. इस दिन भक्तों के ऊपर बिहारी जी की ओर से पुष्प वर्षा की जाती है.

पूतना कथा

होली को लेकर एक और कथा है, मान्यता है कि बचपन में पूतना के द्वारा जहरीले दूध पिलाने के कारण श्रीकृष्ण का रंग नीला हो गया जिससे श्रीकृष्ण खुद को सबसे अलग समझने लगे और उन्हें लगने लगा कि अब गोपियां उन्हें पसंद नहीं करेंगी, उन्हें ऐसे परेशान देखकर यशोदा मां ने उन्हें कहा कि जाकर वह राधा को अपनी पसंद के रंग में रंग दे उन्होनें ऐसा ही किया और राधा-कृष्ण अपने अलौकिक प्रेम में डूब गए तब से यह त्योहार मनाया जाने लगा.

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