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Floodplain : NGT का ऐतिहासिक फैसला,अब यमुना नदी के किनारे नहीं हो सकेगा अतिक्रमण

Floodplain : पर्यावरणविद डॉ. शरद गुप्ता का कहना है कि यह केवल नक्शा या इंजीनियरिंग अभ्यास नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय न्याय के लिए बड़ा कदम है

Floodplain

यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र (Floodplain) को अतिक्रमण और अनियंत्रित शहरीकरण से बचाने की दिशा में पर्यावरणविद डॉ शरद गुप्ता के प्रयास से NGT ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के निर्देश पर 5 अक्टूबर से यमुना के बाढ़ क्षेत्र का भौतिक सीमांकन शुरू होगा. यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी, बल्कि भविष्य में अवैध निर्माण और भूमि उपयोग में बदलाव पर भी लगाम लगाएगी.

पर्यावरणविद डॉ शरद गुप्ता की जनहित याचिका में आया फैसला

यह निर्णय पर्यावरणविद् डॉ. शरद गुप्ता (आगरा) द्वारा दायर की गई जनहित याचिका के फैसले पर आया है.(Floodplain) उनकी तीन साल लंबी कानूनी और पर्यावरणीय लड़ाई के बाद यह सफलता मिली. इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र (Floodplain) का सर्वे पूरा कर लिया है, जिसमें हरियाणा-उत्तर प्रदेश सीमा (असगरपुर) से लेकर प्रयागराज (जहां यमुना गंगा से मिलती है) तक के इलाके को शामिल किया गया है.

यमुना नदी के किनारे लगेंगे पारंपरिक सीमा स्तंभ

सीमांकन प्रक्रिया के तहत नदी से हर 200 मीटर की दूरी पर “मुडीयन” (पारंपरिक सीमा स्तंभ) लगाए जाएंगे, जो नदी के प्राकृतिक क्षेत्र को स्थायी रूप से चिह्नित करेंगे. यह कदम यमुना के चारों ओर एक सुरक्षात्मक घेरा तैयार करेगा, जिससे अतिक्रमण रोका जा सकेगा और पारिस्थितिकी बहाली को प्रोत्साहन मिलेगा.

Floodplain : यमुना के किनारे अवैध अतिक्रमण हटाना होगा आसान

पर्यावरणविद डॉ. शरद गुप्ता का कहना है कि यह केवल नक्शा या इंजीनियरिंग अभ्यास नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय न्याय के लिए बड़ा कदम है. उन्होंने बताया कि सीमांकन होने के बाद अवैध निर्माण और कब्जों को हटाने की प्रक्रिया भी आसान हो जाएगी. ऐसे में अब बाढ़ क्षेत्र का स्पष्ट मानचित्र उपलब्ध होगा. डॉ शरद गुप्ता का यह प्रयास आज भले नदी के किनारे अतिक्रमण करने वाले लोगों को अच्छा न लग रहा हो लेकिन आने वाले समय में जब नदियों का रास्ता साफ होगा तो उसके प्रवाह में कोई दिक्कत नहीं होगी और लोगों के घर जलमग्न नहीं होंगे और तमाम। समस्याओं से निजात मिलेगी.

Floodplain: यमुना नदी की यह पहल बनेगी अन्य नदियों के लिए मिशाल

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल केवल यमुना ही नहीं, बल्कि पूरे देश की नदियों के लिए एक मॉडल साबित हो सकती है. जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने नदियों के अस्तित्व पर गंभीर संकट पैदा कर दिया है. ऐसे में यह कदम आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय नीतियों का नया मानक बन सकता है.

पर्यावरण संरक्षण के लिए डॉ शरद गुप्ता लंबे समय से लड़ रहे हैं कानूनी लड़ाई

पर्यावरणविद डॉ. शरद गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में गंगा नदी के बाढ़ क्षेत्र सीमांकन से जुड़े मामले को भी यमुना नदी मामले से जोड़ने की मांग की है. यदि दोनों मामलों का संयुक्त समाधान निकला, तो गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों के संरक्षण की लड़ाई और मजबूत हो जाएगी.

यह परियोजना महज इंजीनियरिंग का कार्य नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय चेतना में नदियों को पूरी तरीके से उनके संरक्षण का एक अहम प्रयास है. यह आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनको जागरूक करने जैसा है.

पर्यावरणविद डॉ शरद गुप्ता लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, वह निचली अदालतों से लेकर NGT और सुप्रीम कोर्ट तक सैकड़ों मामलों में पूरी तरीके से लगातार लगे हुए हैं. डॉ गुप्ता पेशे से डॉक्टर हैं, वह अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण के कार्यों के लिए खर्च कर रहे हैं और उनको काफी मामलों में बड़ी सफलताएं भी मिल चुकी हैं. पर्यावरण संरक्षण मामलों की लड़ाई के दौरान डॉ गुप्ता के सामने कई बार बड़ी समस्याएं भी आती रहती हैं लेकिन वह निडर होकर उनका सामना करते हैं और बिना रुके अपने मकसद में निरंतर जुटे रहते हैं.

पहाड़ों पर लगातार हो रही छेड़छाड़ से हो रही हैं बड़ी त्रासदी

भारत वर्ष में इस बार बाढ़ ने कई राज्यों में तबाही मचा दी उत्तराखंड ,हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, लेह लद्दाख में कई कई बार पहाड़ों में स्खलन भी होता रहा जिसके कारण बहुत लोगों की जान गई और आर्थिक रूप से भी काफी क्षति हुई. ये सब कहीं न कहीं प्रकृति का इशारा है कि उसके साथ अगर छेड़छाड़ होगी तो यही हाल होगा. मानव ने भी पहाड़ों को काट काट कर होटल, घर और तमाम निर्माण कर दिया है और क्षमता से ज्यादा पर्यटक भी इन स्थलों पर पहुंच रहे हैं , ऐसे में पहाड़ इनके बोझ को कब तक सहेगा? इस बार पहाड़ी क्षेत्रों में हुई घटनाओं ने भी सभी को बता दिया है कि आने वाले समय में हम सभी को मिलकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान देना चाहिए जिससे पर्यावरण असंतुलन के कारणों से हो रही घटनाओं से बचा जा सके.

नदियों के क्षेत्र में अतिक्रमण के कारण चुकानी पड़ रही है बड़ी कीमत

मानव ने नदियों के क्षेत्र में भी काफी अतिक्रमण किया है. नदियों के क्षेत्र में पूरी पूरी कॉलोनी बसा दी हैं. बारिश के समय इन नदियों की धारा को चलने की जगह नहीं मिल पाती है इसीलिए नदियों के किनारे और उसके क्षेत्र में बने घर पानी में डूब जाते हैं. इस बार प्रयागराज में नदियों के किनारे बने घर पिछले दो महीने से जलमग्न है और लोगों का काफी नुकसान भी हुआ है. ऐसे में जिला प्रशासन को भी पानी में फंसे लोगों को सुरक्षित उनके घरों से बाहर निकालना , उनको भोजन पहुंचना और बाद पीड़ित शिविरों में उनके रहने की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है.

हिमाचल प्रदेश में तबाही पर्यावरण से खिलवाड़ का है नतीजा ( floodplain)

हिमाचल प्रदेश में भी बीते कई वर्षों में प्रकृति के साथ काफी छेड़छाड़ हुई और पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हजारों होटल बने और व्यास नदी के किनारे भी काफी अतिक्रमण हुआ और इस बार व्यास नदी इन सभी होटलों को अपने साथ बहाकर ले गई और काफी होटलों को जमीदोंज कर दिया. व्यास नदी ने फोर लेन की सड़क का काफी बड़ा हिस्सा तोड़कर अपने क्षेत्र में ले लिया और आज कई जगह सड़कों पर नदी बहती हुई दिख रही है. नदी को भी चलने के लिए अपना रास्ता चाहिए जब उसे अपना ही रास्ता नहीं मिलता तो ऐसी त्रासदी होती रहती हैं.

उत्तराखंड में पहाड़ों और जंगलों को नष्ट करना है काफी घातक

उत्तराखंड में भी पहाड़ों के साथ मानव ने खूब तोड़फोड़ की और जंगलों को भी बड़े पैमाने पर काट डाला. मसूरी को अंग्रेजों ने इसलिए बनाया था कि शांत वातावरण और भीड़ से दूर वाली जगह पर मानव सकून से रह सके. आज ये हालत है कि देहरादून से मात्र 30 किलोमीटर दूर स्थित मसूरी जाने के रास्ते पर 5 से 6 घंटे का जाम लगना आम बात है. पर्यटकों और वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जिसके कारण मुनाफा कमाने के लिए होटल और रिजॉर्ट्स पहाड़ काट काट कर बन चुके हैं. पहाड़ इस दवाब को कब तक झेले और आखिरकार उत्तराखंड में प्रकृति लोगों को आगाह कर रही है कि उसके साथ इतना खिलवाड़ मत करो कि उसको रौद्र रूप धारण करना पड़े.

भारत एक्सप्रेस



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